क्या हमारा भाग्य जन्म से तय होता है? कर्म, ज्ञान और जीवन का वैदिक रहस्य | Krishna Guruji

क्या हमारा भाग्य जन्म से तय होता है? प्रश्न उपनिषद और अथर्ववेद पर कृष्णा गुरुजी का संदेश
भाग्य जन्म की परिस्थिति दे सकता है, लेकिन कर्म जीवन को दिशा देता है। प्रश्न उपनिषद, नचिकेता, सेवा, ज्ञान और संतोष पर कृष्णा गुरुजी का प्रेरक चिंतन।

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क्या हमारा भाग्य जन्म से तय होता है? कर्म, ज्ञान और जीवन का रहस्य

क्या हमारा भाग्य जन्म से ही तय हो जाता है? क्या जीवन की सफलता और असफलता भाग्य का परिणाम है? अथवा हमारे कर्म जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं?

ये प्रश्न लगभग हर मनुष्य के मन में आते हैं। हालांकि, कई लोग असफलता मिलने पर अपने भाग्य को दोष देते हैं। कुछ लोग ग्रहों या पिछले जन्म को कारण मानते हैं।

इसके विपरीत, मेरा मानना है कि मनुष्य को जन्म मिलना ही सबसे बड़ा भाग्य है। उसके बाद हमें भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। इसके बजाय, हमें अपने विवेक और कर्म के भरोसे आगे बढ़ना चाहिए।

“भाग्य आपको जन्म की परिस्थिति देता है। लेकिन कर्म आपके जीवन को दिशा देता है।”

— कृष्णा गुरुजी

क्या यह प्रश्न प्रश्न उपनिषद में पूछा गया है?

“क्या हमारा भाग्य जन्म से तय होता है?” यह प्रश्न किसी उपनिषद में इसी भाषा में नहीं पूछा गया है। यह आज के जीवन से जुड़ा आधुनिक प्रश्न है।

फिर भी, प्रश्न उपनिषद मनुष्य को जीवन के मूल प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता है। इसमें प्राण, जीवन, चेतना, ॐ और आत्मज्ञान से संबंधित जिज्ञासाएँ सामने आती हैं।

इसलिए, इस आधुनिक प्रश्न पर प्रश्न उपनिषद की जिज्ञासा-परंपरा के माध्यम से विचार किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज का संवाद मिलता है। नचिकेता ने मृत्यु, आत्मा और जीवन के सत्य को जानना चाहा। उसने अस्थायी सुखों के स्थान पर स्थायी ज्ञान को चुना।

आप कठोपनिषद और नचिकेता से संबंधित लेख भी पढ़ सकते हैं।

वीडियो: क्या हमारा भाग्य जन्म से तय होता है?

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मनुष्य जन्म मिलना ही सबसे बड़ा भाग्य है

सबसे पहले, यह समझिए कि मनुष्य शरीर मिलना अपने आप में दुर्लभ अवसर है। यह शरीर पंचतत्त्व से बना है। इसके माध्यम से हम सोचते, समझते और कर्म करते हैं।

इसलिए, मनुष्य जन्म मिलने के बाद भाग्य को कोसना उचित नहीं है। हमें यह सोचना चाहिए कि हम इस जीवन का उपयोग कैसे करेंगे।

हम किस परिवार में जन्म लेते हैं, यह हमारे नियंत्रण में नहीं था। हमारी भाषा और प्रारंभिक जीवनशैली भी परिवार से मिलती है। फिर भी, विवेक विकसित होने के बाद हमारे निर्णय हमारे होते हैं।

अतः जन्म की परिस्थिति भाग्य हो सकती है। लेकिन उस परिस्थिति में आगे बढ़ना हमारे कर्म पर निर्भर करता है।

कलियुग पुराण चिंतन:

मनुष्य जन्म मिल जाना सबसे बड़ा भाग्य है। अब प्रश्न यह है कि हम अपने कर्मों से संसार को क्या देकर जाएँगे।

शरीर के साथ कुछ आंतरिक विकार भी मिलते हैं

मनुष्य को स्वस्थ शरीर मिल सकता है। हालांकि, उसके भीतर कुछ स्वाभाविक विकार भी हो सकते हैं।

आलस्य, कामुकता, अनियंत्रित इच्छा, भय, क्रोध और अहंकार जीवन में दुख लाते हैं। इनसे मिलने वाला सुख स्थायी नहीं होता। इसी प्रकार, इनके कारण मिलने वाला दुख भी स्थायी नहीं होता।

इसलिए, हमें इन भावों को पहचानना चाहिए। इसके बाद, विवेक के माध्यम से उन्हें नियंत्रित करना चाहिए।

क्रोध क्या है?

मेरे अनुसार, क्रोध किसी दूसरे की गलती की सजा स्वयं को देना है। क्रोध सामने वाले को कम और हमारे शरीर को अधिक नुकसान पहुँचाता है।

इसके कारण मन अशांत होता है। साथ ही, पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में दरार पैदा होती है।

अनियंत्रित इच्छा क्या करती है?

हम अक्सर अपनी स्थिति की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति से करते हैं। फिर हम उसकी सफलता देखकर दुखी होने लगते हैं।

वास्तव में, किसी दूसरे की सफलता से हमारा नुकसान नहीं होता। हमारी तुलना और अनियंत्रित इच्छाएँ हमें दुखी करती हैं।

अतः हमें दूसरों से तुलना करने के स्थान पर अपनी यात्रा देखनी चाहिए।

जीवन ज्ञान के बिना अधूरा है

जीवन में केवल जानकारी पर्याप्त नहीं है। ज्ञान का प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

मैं इसे एक सरल क्रम के माध्यम से समझाता हूँ:

जीवन ज्ञान के बिना अधूरा है।
जो ज्ञान भाव न जगाए, वह ज्ञान अधूरा है।
जो भाव कर्म में न बदले, वह भाव अधूरा है।
जो कर्म तृप्ति न दे, वह कर्म अधूरा है।

ज्ञान पहले हमारे भीतर संवेदना पैदा करे। इसके बाद, वह संवेदना किसी सकारात्मक कर्म में बदले। अंततः, उस कर्म से संतोष और तृप्ति मिलनी चाहिए।

यदि ज्ञान हमारे भीतर कोई परिवर्तन नहीं लाता, तो वह केवल सुनी हुई जानकारी बनकर रह जाता है।

इसलिए, प्रत्येक आध्यात्मिक सत्र के बाद स्वयं से पूछिए:

  • क्या इस ज्ञान ने मेरे व्यवहार को बदला?
  • क्या मैं पहले से अधिक शांत हुआ?
  • क्या मेरे संबंधों में सुधार आया?
  • क्या मैंने किसी जरूरतमंद की सहायता की?
  • क्या मेरे भीतर संतोष बढ़ा?

आवश्यकता पूरी होने के बाद क्या करें?

जीवन में प्रत्येक व्यक्ति की कुछ मूल आवश्यकताएँ होती हैं। हमें भोजन, वस्त्र, घर, स्वास्थ्य और परिवार की सुरक्षा चाहिए।

इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर्म करना आवश्यक है। इसलिए, मैं धन कमाने या प्रगति करने के विरुद्ध नहीं हूँ।

आप ईमानदारी से कमाइए। अपने परिवार को सुरक्षित रखिए। साथ ही, भविष्य के लिए उचित व्यवस्था भी कीजिए।

लेकिन अधिक कमाने की लालसा कभी समाप्त नहीं होती। इसीलिए कहा जाता है कि किसी भी चीज की अधिकता हानिकारक हो सकती है। यहां तक कि समाज सेवा में भी संतुलन आवश्यक है।

अतः अपनी आवश्यकता पूरी होने के बाद किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता पर ध्यान दीजिए। उदाहरण के लिए, किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में मदद कीजिए। या किसी दिव्यांग व्यक्ति को आत्मविश्वास दीजिए। अथवा किसी निराश व्यक्ति को आशा दीजिए।

अपनी इच्छाओं के पीछे ही मत भागिए। किसी दूसरे की आवश्यकता पूरी करने का प्रयास भी कीजिए।

खुश रहें और खुश रखें

कलियुग पुराण का सरल संदेश है—खुश रहें और खुश रखें।

सबसे पहले, अपने पंचतत्त्व से बने शरीर को स्वस्थ और प्रसन्न रखिए। इसके बाद, अपने परिवार और संबंधों की प्रसन्नता का ध्यान रखिए।

फिर, यह देखिए कि आपके कारण किसी अनजान व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान कैसे आ सकती है। वह अनजान व्यक्ति भी उसी ब्रह्मांड का हिस्सा है, जिसका हिस्सा हम हैं।

अपने भीतर ब्रह्मांड को देखना और ब्रह्मांड में स्वयं को देखना गहरा आध्यात्मिक चिंतन है।

शिकायत के बजाय जिम्मेदारी स्वीकार करें

कई बार हम अपनी असफलता का कारण भाग्य, ग्रहों या किसी दूसरे व्यक्ति को मान लेते हैं। हालांकि, हमें पहले स्वयं से बात करनी चाहिए।

अपने जीवन के सबसे अच्छे निर्णायक आप स्वयं हो सकते हैं। इसलिए, किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले अपने निर्णयों और प्रयासों को देखिए।

स्वयं से पूछिए:

  • क्या मैंने पूरी तैयारी की थी?
  • क्या मैंने सही दिशा में प्रयास किया?
  • क्या मुझे अपना तरीका बदलना चाहिए?
  • क्या मेरी नीयत और कार्य दोनों सही थे?
  • क्या मुझे कुछ समय रुककर दोबारा प्रयास करना चाहिए?

यदि लाख प्रयासों के बाद भी परिणाम न मिले, तो कुछ समय के लिए उसे छोड़ दीजिए। परिस्थिति को ध्यान से देखिए। अपने प्रयासों को छाँटिए और शेष ईश्वर को समर्पित कीजिए।

इसे हम Observe, Filter and Surrender का सूत्र कह सकते हैं।

दिव्यांगता ने मेरा कर्म नहीं रोका

मेरे जीवन में एक समय ऐसा आया, जब मैं दिव्यांग हो गया। इसके बाद, मेरे सामने दो रास्ते थे।

पहला रास्ता अपनी सीमाओं और इच्छाओं के बारे में सोचते रहने का था। दूसरा रास्ता किसी दूसरे की आवश्यकता पूरी करने का था।

मैंने दूसरा रास्ता चुना। मैंने गरीबों, दिव्यांगों, कैदियों और मानसिक रूप से परेशान लोगों की आवश्यकताओं को समझने का प्रयास किया।

इसके बाद, जीवन में कई ऐसे अवसर आए जिनकी मैंने कल्पना नहीं की थी।

अमेरिका, सिएटल और अन्य स्थानों पर सेवा के अवसर मिले। अनेक साथियों ने इन कार्यों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।

इसलिए, मैं इसे केवल भाग्य नहीं कहता। यह सेवा की सोच, स्पष्ट नीयत और सामूहिक कर्म का परिणाम भी था।

निस्संदेह, कोई व्यक्ति अकेला बड़ा सेवा कार्य पूरा नहीं कर सकता। उसे सहयोगी, मार्गदर्शक और सेवा-भाव रखने वाले लोग चाहिए।

कठोपनिषद से नचिकेता का संदेश

कठोपनिषद में नचिकेता ने अस्थायी भोगों के स्थान पर सत्य का ज्ञान चुना। यमराज ने उसे अनेक आकर्षक विकल्प दिए। फिर भी, नचिकेता अपने मूल प्रश्न से नहीं भटका।

इस प्रसंग का आधुनिक जीवन में बड़ा महत्व है। हमें भी यह तय करना है कि हम केवल तात्कालिक सुख चाहते हैं या स्थायी संतोष।

कठोपनिषद का अध्ययन करने के लिए आप आईआईटी कानपुर की गीता सुपरसाइट पर उपलब्ध शास्त्रीय सामग्री देख सकते हैं।

साथ ही, अथर्ववेद के उपनिषद, ॐ और चेतना की चार अवस्थाओं पर प्रकाशित लेख भी पढ़ें।

हम साथ क्या लेकर जाएँगे?

जीवन की कमाई आवश्यक है। संपत्ति और संसाधन परिवार की सुरक्षा में सहायता करते हैं।

फिर भी, हमें यह समझना चाहिए कि इनमें से कुछ भी स्थायी रूप से हमारे साथ नहीं जाएगा।

पत्नी, मकान तक।
समाज, श्मशान तक।
पुत्र, अग्निदान तक।
आपके कर्म, भगवान तक।

— कृष्णा गुरुजी चिंतन

इसलिए, स्वयं से पूछिए कि आप संसार में क्या छोड़कर जाएँगे। साथ ही, यह भी सोचिए कि आप अपने भीतर क्या लेकर जाएँगे।

आपने किसी की शिक्षा में सहायता की हो सकती है।

आपने किसी दुखी व्यक्ति को आशा दी हो सकती है। आपने किसी असहाय व्यक्ति के अभाव को दूर किया हो सकता है।

यही कर्म आपके जीवन को अर्थ देते हैं।

एक छोटा ध्यान और आत्मचिंतन

अब अपनी आँखें धीरे से बंद कीजिए।

एक लंबी और गहरी श्वास लीजिए। फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़िए।

अपने जन्म से आज तक की यात्रा को याद कीजिए। उस पंचतत्त्व के शरीर के प्रति कृतज्ञता अनुभव कीजिए, जो आपको मिला है।

अब सोचिए कि आपको जीवन से कितना कुछ मिला है। शायद आपको परिवार मिला, घर मिला और अनेक अनुभव मिले।

हालांकि, शिकायत करने की आदत हमें प्राप्त सुख से दूर कर देती है। इसलिए, आज स्वयं से एक संकल्प कीजिए:

मैं अपने भाग्य को नहीं कोसूँगा।

मैं शिकायत कम करूँगा।

मैं अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करूँगा।

मैं अपने शरीर को प्रसन्न रखूँगा।

मैं किसी दूसरे के जीवन में खुशी लाने का प्रयास करूँगा।

एक बार फिर लंबी और गहरी श्वास लीजिए।

लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

जब आप स्वयं को पूर्ण अनुभव करें, तब मुस्कान के साथ अपनी आँखें खोलें।

ज्ञान को जीवन में उतारिए

किसी कथा या प्रवचन को सुनना ही पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक ज्ञान के साथ कोई स्पष्ट जीवन-संदेश भी होना चाहिए।

इसलिए, आज के संदेश को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

ज्ञान तभी उपयोगी है, जब वह आने वाले जीवन में हमारी सहायता करे।

वेदों के आधुनिक जीवन में महत्व को समझने के लिए आप ये लेख भी पढ़ सकते हैं:

निष्कर्ष: भाग्य नहीं, आज के कर्म पर ध्यान दें

भाग्य ने आपको जन्म की परिस्थिति दी होगी। हालांकि, वर्तमान जीवन की दिशा आपके निर्णय और कर्म निर्धारित कर सकते हैं।

इसलिए, जो आपके पास नहीं है, केवल उसी पर ध्यान मत दीजिए।

इसके बजाय, आपको जो शरीर, परिवार, ज्ञान और अवसर मिले हैं, उन्हें भी देखिए।

अपनी आवश्यकताओं को पूरा कीजिए। इसके बाद, किसी दूसरे की आवश्यकता पूरी करने का प्रयास कीजिए।

सबसे पहले स्वयं को खुश रखिए। साथ ही, अपने परिवार और समाज के लिए भी प्रसन्नता का कारण बनिए।

खुश रहें, खुश रखें।

जीवन आपका, सुझाव मेरा।

— कृष्णा गुरुजी
आध्यात्मिक चिंतक, योग शिक्षक एवं मानवसेवी

निशुल्क दैनिक आध्यात्मिक सत्र

वेद, उपनिषद और आधुनिक जीवन से जुड़े प्रश्नों पर कृष्णा गुरुजी के साथ निशुल्क सत्र में जुड़ें।

समय: प्रतिदिन रात 8:30 बजे (IST)
Zoom Meeting ID: 9826070286
शुल्क: पूर्णतः निशुल्क

इस संदेश को अपने परिवार और मित्रों के साथ साझा करें।

संभव है कि यह विचार किसी व्यक्ति को शिकायत से निकालकर कर्म की दिशा दे दे।

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