अथर्ववेद के उपनिषद: मुण्डक से ब्रह्मज्ञान और माण्डूक्य से जानें ॐ व चेतना की चार अवस्थाएँ

Krishna Guruji explaining Atharvaveda Upanishads, Mundaka Upanishad, Om Meditation, Om Chanting and the four states of consciousness
कृष्णा गुरुजी से जानें अथर्ववेद के उपनिषद, ॐ का रहस्य, मन की चार अवस्थाएँ, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय तथा सरल ॐ ध्यान और चैंटिंग का महत्व।

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अथर्ववेद के उपनिषद: मुण्डक से ब्रह्मज्ञान और माण्डूक्य से जानें ॐ व चेतना की चार अवस्थाएँ

अथर्ववेद के उपनिषद मानव जीवन, आत्मज्ञान, मन और चेतना के गहरे रहस्यों को समझाते हैं। इस विशेष आध्यात्मिक सत्र में कृष्णा गुरुजी ने मुण्डक उपनिषद के संदेश के साथ ॐ की शक्ति पर चर्चा की। इसके अलावा, उन्होंने चेतना की चार अवस्थाओं को सरल भाषा में समझाया। अंत में ॐ chanting और ध्यान भी करवाया गया।

इस सत्र का उद्देश्य केवल शास्त्रीय जानकारी देना नहीं था। बल्कि, इसका उद्देश्य व्यक्ति को अपने मन की गतिविधियों को समझने और ध्यान के माध्यम से आंतरिक शांति अनुभव करने के लिए प्रेरित करना था।

वीडियो देखें:

अथर्ववेद के उपनिषद, ॐ ध्यान और चेतना की चार अवस्थाएँ

अथर्ववेद के प्रमुख उपनिषद

अथर्ववेद से संबंधित प्रमुख उपनिषदों में मुण्डक, माण्डूक्य और प्रश्न उपनिषद विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। हालांकि इनके विषय अलग-अलग हैं, फिर भी इनका लक्ष्य व्यक्ति को बाहरी जानकारी से आगे आत्मज्ञान की ओर ले जाना है।

मुण्डक उपनिषद परा विद्या और अपरा विद्या के बीच अंतर बताता है। दूसरी ओर, माण्डूक्य उपनिषद ॐ और चेतना की चार अवस्थाओं का अत्यंत गहरा विवेचन करता है। इसलिए इस सत्र में दोनों उपनिषदों के संदेश को जीवन और ध्यान से जोड़कर समझाया गया।

मुण्डक उपनिषद क्या संदेश देता है?

अथर्ववेद का एक प्रमुख उपनिषद है। यह मनुष्य को केवल जानकारी प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखता। इसके विपरीत, यह उसे उस ज्ञान की ओर ले जाता है जिससे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो सके।

इस उपनिषद में ज्ञान को मुख्यतः दो भागों में समझाया गया है:

  • अपरा विद्या: वेद, भाषा, कर्मकांड और सांसारिक विषयों का ज्ञान।
  • परा विद्या: वह ज्ञान जिसके द्वारा अक्षर ब्रह्म और आत्मस्वरूप का अनुभव होता है।

अतः मुण्डक उपनिषद का संदेश है कि केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान को जीवन में अनुभव करना भी आवश्यक है।

ॐ और मन की चार अवस्थाएँ

ॐ केवल उच्चारण किया जाने वाला एक शब्द नहीं है। यह ध्वनि, मौन, चेतना और आत्मचिंतन का प्रतीक भी है। माण्डूक्य उपनिषद में ॐ के माध्यम से चेतना की चार अवस्थाओं को समझाया गया है।

1. जाग्रत अवस्था

जाग्रत अवस्था में व्यक्ति बाहरी संसार के प्रति सचेत रहता है। वह शरीर, इंद्रियों और आसपास की घटनाओं को अनुभव करता है। इसे हम सामान्य aware mode भी कह सकते हैं।

2. स्वप्न अवस्था

स्वप्न अवस्था में शरीर विश्राम करता है। हालांकि मन अपनी स्मृतियों, कल्पनाओं और अनुभवों का संसार बनाता रहता है। इस समय बाहरी संसार से अधिक आंतरिक दृश्य सक्रिय रहते हैं।

3. सुषुप्ति अवस्था

सुषुप्ति गहरी नींद की अवस्था है। इस स्थिति में स्पष्ट स्वप्न और सक्रिय विचार दिखाई नहीं देते। फिर भी व्यक्ति जागने के बाद कहता है कि उसे अच्छी नींद आई। अर्थात अनुभव का एक सूक्ष्म आधार बना रहता है।

4. तुरीय अवस्था

तुरीय का अर्थ केवल चौथी सामान्य स्थिति नहीं है। यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के पीछे उपस्थित शुद्ध चेतना की ओर संकेत करती है। इसे साक्षीभाव, गहरा मौन और आंतरिक समत्व भी कहा जा सकता है।

इस अवस्था को केवल शब्दों से समझना कठिन है। इसलिए ध्यान, आत्मनिरीक्षण और नियमित अभ्यास महत्वपूर्ण हैं।

ॐ के उच्चारण द्वारा अवस्थाओं को समझना

कृष्णा गुरुजी ने सत्र में ॐ के उच्चारण द्वारा मन की यात्रा को सरल रूप में समझाया। ॐ का उच्चारण करते समय ध्वनि धीरे-धीरे बाहर से भीतर की ओर जाती है। इसके बाद ध्वनि समाप्त होती है और मौन अनुभव होता है।

इसी मौन में व्यक्ति अपने विचारों, श्वास और आंतरिक स्थिति को देख सकता है। इसलिए ॐ chanting केवल बोलना नहीं है। बल्कि, ध्वनि के बाद आने वाले मौन को सुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पहली बार ॐ का उच्चारण करें, तो अपनी आवाज सुनें। दूसरी बार ध्वनि की गहराई अनुभव करें। तीसरी बार विचारों के बीच आने वाले मौन को महसूस करने का प्रयास करें।

हालांकि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। इसलिए ध्यान को किसी निश्चित परिणाम की परीक्षा न बनाएं। इसे सहज अभ्यास के रूप में अपनाएं।

सत्र में कराया गया ॐ ध्यान

सत्र के अंतिम भाग में कृष्णा गुरुजी ने सभी साधकों को आंखें बंद करने के लिए कहा। इसके बाद श्वास को सहज रखते हुए सामूहिक ॐ chanting करवाई गई।

ध्यान की सरल प्रक्रिया इस प्रकार रही:

  1. शांत स्थान पर आराम से बैठें।
  2. रीढ़ को अपनी सुविधा के अनुसार सीधा रखें।
  3. आंखें धीरे से बंद करें।
  4. नाक से सहज श्वास अंदर लें।
  5. लंबी और शांत ध्वनि में ॐ का उच्चारण करें।
  6. ध्वनि समाप्त होने के बाद कुछ क्षण मौन सुनें।
  7. अपने विचारों से संघर्ष न करें। केवल उन्हें आते-जाते देखें।

नियमित अभ्यास से व्यक्ति अपने मन की गति को बेहतर ढंग से पहचान सकता है। साथ ही, उसे शांति और एकाग्रता का अनुभव भी हो सकता है।

तनाव के समय ॐ chanting कैसे सहायक हो सकती है?

जब मन तनाव, चिंता या उलझन से भर जाता है, तब व्यक्ति अक्सर अपने विचारों में फंस जाता है।

ऐसे समय कुछ मिनट शांत बैठकर लंबा ॐ उच्चारण करना मन को वर्तमान क्षण में लौटाने का माध्यम बन सकता है।

सबसे पहले अपनी श्वास को सहज करें। फिर बिना जोर लगाए ॐ का उच्चारण करें।

इसके बाद ध्वनि समाप्त होने पर मौन को सुनें। यह प्रक्रिया मन को रोकने का दबाव नहीं बनाती। बल्कि, व्यक्ति को विचारों का साक्षी बनने का अवसर देती है।

महत्वपूर्ण: ध्यान और chanting मानसिक शांति के सहायक अभ्यास हैं। गंभीर या लगातार मानसिक अथवा शारीरिक परेशानी होने पर योग्य चिकित्सक की सलाह भी आवश्यक है।

“ॐ में रहकर, ॐ में मिलकर” – सत्र का आध्यात्मिक गीत

इस सत्र में कृष्णा गुरुजी ने ॐ के संदेश को एक सरल गीत के माध्यम से भी प्रस्तुत किया:

ॐ में रहकर, ॐ में मिलकर,
अंततः ॐ में मिलना है।

इस पंक्ति का भाव है कि हमारा जीवन ध्वनि, श्वास, चेतना और मौन से जुड़ा है। इसलिए ॐ हमें बाहर से भीतर और स्वयं से समष्टि की ओर जाने का संदेश देता है।

ॐ का वास्तविक महत्व क्या है?

ॐ का महत्व केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति को अपनी श्वास, ध्वनि और मन के प्रति जागरूक करता है। साथ ही, यह हमें याद दिलाता है कि शब्दों के पीछे मौन है और विचारों के पीछे एक देखने वाली चेतना है।

जब व्यक्ति नियमित रूप से कुछ समय स्वयं के साथ बैठता है, तब वह अपनी प्रतिक्रियाओं को समझने लगता है। परिणामस्वरूप, उसके व्यवहार, सोच और जीवन-दृष्टि में धीरे-धीरे परिवर्तन आ सकता है।

कृष्णा गुरुजी का संदेश

कृष्णा गुरुजी के अनुसार, आध्यात्मिकता का अर्थ केवल ग्रंथों को पढ़ना नहीं है। बल्कि, उनके संदेश को अपने जीवन में अनुभव करना भी है।

यदि मन अशांत हो, तो कुछ समय आंखें बंद करें। फिर सहज श्वास लें और ॐ का शांत उच्चारण करें। इसके बाद ध्वनि के पीछे उपस्थित मौन को सुनें। संभव है कि यही मौन आपको स्वयं के अधिक निकट ले जाए।

जीवन आपका, सुझाव मेरा।


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अथर्ववेद की वैदिक परंपरा और इसकी संहिताओं के बारे में अधिक जानकारी के लिए

भारत सरकार के Vedic Heritage Portal

पर पढ़ सकते हैं।


लेखक: Krishna Guruji – Spiritual Mentor, Yoga Teacher and Humanitarian

प्रतिदिन आध्यात्मिक सत्र: रात 8:30 बजे (IST)
Zoom Meeting ID: 9826070286

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