गणेश जी शुभ हैं, तो उनका विसर्जन क्यों? | कलियुग पुराण | कृष्णा गुरुजी

गणेश जी शुभ हैं तो उनका विसर्जन क्यों—गणेश प्रतिमा के साथ नमस्ते करते कृष्णा गुरुजी
गणेश जी को शुभ मानकर घर लाते हैं, फिर उनका विसर्जन क्यों करते हैं? कृष्णा गुरुजी से जानें विदाई, आत्मचिंतन और सेवा का संदेश।

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 गणपति बप्पा मोरया! हम गणेश जी को बड़े प्रेम से घर लाते हैं। ढोल बजाते हैं और मंगल की कामना करते हैं।

फिर कुछ दिनों बाद प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। तब मन पूछता है: गणेश जी शुभ हैं, तो उनका विसर्जन क्यों?

इस प्रश्न पर मैंने अपने सत्संग में विचार साझा किए हैं। पहले वीडियो देखें। फिर अपने जीवन से इस प्रश्न का उत्तर जोड़कर देखें।

▶ गणेश विसर्जन पर कृष्णा गुरुजी का पूरा सत्संग YouTube पर देखें

गणेश जी शुभ हैं, तो उनका विसर्जन क्यों?

प्रतिमा का विसर्जन शुभता की विदाई नहीं है। मेरी कलियुग पुराण की दृष्टि में यह जीवन के परिवर्तन पर सोचने का अवसर है।

हम किसी के आने का स्वागत करते हैं। फिर समय आने पर विदाई भी स्वीकार करते हैं।

गणेश स्थापना और विसर्जन को मैं जीवन के आगमन और विदाई के प्रतीक की तरह देखता हूँ। यह मेरी आध्यात्मिक व्याख्या है।

इससे हमें एक प्रश्न मिलता है: साथ मिले समय का हमने क्या उपयोग किया?

गणेश जी के स्वरूप से दस दिन क्या सीखें?

हम प्रतिमा के सामने आरती करते हैं। साथ ही, उनके स्वरूप से अपने व्यवहार की प्रेरणा भी ले सकते हैं।

बड़े कान हमें अधिक सुनने की याद दिलाएँ। छोटा मुख सोचकर बोलना सिखाए। विशाल मस्तक विवेक से निर्णय लेने की प्रेरणा दे।

इसी तरह, छोटी आँखों को एकाग्र ध्यान के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं। सूँड़ हमें आसपास की परिस्थितियों के

प्रति सजग रहने की याद दिला सकती है। इन अर्थों पर मेरा चिंतन गणेश जी को मंगलमूर्ति क्यों कहते हैं लेख में भी पढ़ें।

विसर्जन से पहले अपने कर्मों को देखें

कल्पना कीजिए कि गणेश जी हमारे घर अतिथि बनकर आए हैं। हमने उनकी पूजा की।

अब विदाई के समय वे पूछें: “इन दिनों में तुम्हारे व्यवहार से किसे राहत मिली?”

क्या हमने परिवार में किसी की बात ध्यान से सुनी किसी जरूरतमंद की सहायता की?

क्या किसी के जीवन का एक छोटा-सा विघ्न कम किया?

ये प्रश्न पूजा का हिसाब नहीं माँगते। बल्कि हमें आरती के शब्दों पर विचार करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

आरती का भाव सेवा तक कैसे पहुँचे?

गणेश आरती में आँख, काया, संतान और माया की कामना आती है। मेरे लिए इन शब्दों का एक मानवीय संदेश भी है।

हम नेत्र चिकित्सा या नेत्रदान की जागरूकता में सहयोग कर सकते हैं। कुष्ठ रोग से प्रभावित व्यक्तियों से सम्मानपूर्वक मिल सकते हैं।

इसके अलावा, संतान की इच्छा रखने वाले दंपतियों को संवेदनशील सहयोग दे सकते हैं। निर्धन परिवार के बच्चे की पढ़ाई में सहायता कर सकते हैं।

हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सेवा का रास्ता चुन सकता है।

आरती के एक शब्द पर मेरा विचार “बाँझन को गर्भ देत” विषयक लेख में पढ़ें।

उसमें संतान के प्रति समान भाव रखने का संदेश है।

अगले वर्ष बप्पा आएँ, तो क्या उत्तर देंगे?

विसर्जन के समय हम अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण देते हैं। तब अपने लिए भी एक संकल्प लें।

अगले गणेशोत्सव तक हम किसकी कठिनाई कम करने का प्रयास करेंगे?

शुरुआत स्वयं से भी हो सकती है। अपने क्रोध, अहंकार या तनाव को समझें। फिर घर और समाज में

अधिक धैर्य से व्यवहार करें। मेरी दृष्टि में यही मंगलमूर्ति की सीख को अपने जीवन में उतारना है।

प्रकृति का ध्यान रखकर करें विसर्जन

विदाई का भाव प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी से भी जुड़ सकता है।

मिट्टी की प्रतिमा, प्राकृतिक रंग और उचित विसर्जन व्यवस्था चुनें।

अपने क्षेत्र के स्थानीय निर्देशों का पालन करें।

महाराष्ट्र पर्यटन विभाग ने भी गणेशोत्सव में पर्यावरण के अनुकूल प्रतिमा और सजावट का उल्लेख किया है।

गणेश जी का विसर्जन करते समय एक संकल्प साथ रखें: प्रतिमा को विदा करेंगे,

लेकिन उससे मिली सीख को अपने व्यवहार में जगह देंगे।

अगले वर्ष बप्पा आएँ, तो हम स्वयं से पूछ सकें: “क्या मैं किसी के जीवन का विघ्न कम कर पाया?”

गणपति बप्पा मोरया!

— कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’
अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक

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