गणेश आरती में “बाँझन को पुत्र देत” नहीं, “बाँझन को गर्भ देत” गाएँ | Kaliyug Puran
गणेश आरती बाँझन को गर्भ देत—यह केवल एक शब्द बदलने का विचार नहीं, बल्कि पुत्र और पुत्री को हमारी प्रार्थना में समान स्थान देने का भाव है। मैंने अपनी पुस्तक Kaliyug Puran में भी इस विषय पर अपने विचार रखे हैं। इस गणेश उत्सव मेरा सभी गणेश प्रेमियों से आत्मीय निवेदन है कि आरती गाते समय इस एक शब्द और उसके भाव पर जरूर विचार करें।
— Krishna Kant Mishra (Krishna Guruji), Author of Kaliyug Puran
पहले मेरा यह संदेश देखें
▶ YouTube Short:
गणेश आरती करते वक्त इस एक शब्द का ध्यान रखें | Krishna Guruji
▶ Instagram Reel:
गणेश आरती पर Krishna Guruji का संदेश देखें
एक बच्ची के प्रश्न ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया
हम बचपन से गणेश जी की आरती गाते और सुनते आए हैं। कई बार शब्द इतने परिचित हो जाते हैं कि हम श्रद्धा से उन्हें गाते तो हैं, लेकिन उनके भाव पर दोबारा विचार नहीं करते।
गणेश आरती की प्रसिद्ध पंक्ति है—
“अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।”
कुछ बच्चियों ने मुझसे एक बहुत सहज प्रश्न किया—
“गुरुजी, बाँझन को पुत्र देत क्यों? पुत्री क्यों नहीं?”
प्रश्न छोटा था, लेकिन मेरे मन को छू गया।
मैंने सोचा कि यदि “पुत्र” हटाकर केवल “पुत्री” कर दिया जाए तो भी बात पूरी नहीं होगी। फिर हम एक के स्थान पर दूसरे लिंग को चुन रहे होंगे।
तब मुझे एक ऐसा शब्द उचित लगा जिसमें पुत्र और पुत्री दोनों समाहित हैं—
“गर्भ।”
“पुत्र देत” के स्थान पर “गर्भ देत” क्यों?
इसलिए मेरा निवेदन है कि गणेश आरती में इस पंक्ति को इस भाव से गाएँ—
“अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बाँझन को गर्भ देत, निर्धन को माया।”
“पुत्र” नहीं—“गर्भ।”
क्योंकि गर्भ में पुत्र आए या पुत्री, दोनों ही संतान हैं। हम भगवान से गर्भ और संतान का आशीर्वाद माँगें।
उस गर्भ में पुत्र आए या पुत्री—यह प्रकृति, परमात्मा और उस संतान के भाग्य पर छोड़ दें।
हमारी प्रार्थना स्वस्थ, संस्कारी और सद्बुद्धि वाली संतान के लिए हो।
प्रार्थना संतान की हो, उसके लिंग की नहीं।
Kaliyug Puran में भी मैंने यही भाव लिखा है
Kaliyug Puran में मैंने इस विषय को आज के समय और आज की सामाजिक चेतना से जोड़कर देखने का प्रयास किया है।
मेरे लिए धर्म का अर्थ केवल शब्दों को दोहराना नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे भाव को अपने समय के विवेक से समझना भी है।
गणेश जी स्वयं बुद्धि और विवेक के देवता माने जाते हैं। इसलिए यदि आज की बेटी हमसे प्रश्न करती है कि
हमारी प्रार्थना में केवल पुत्र की कामना क्यों हो, तो उसके प्रश्न को सुनना भी विवेक का ही हिस्सा है।
📖 Kaliyug Puran – Krishna Guruji:
Kaliyug Puran पुस्तक पढ़ें
आज बेटियाँ किस क्षेत्र में पीछे हैं?
जिस समय ऐसी पंक्तियाँ समाज में प्रचलित हुई होंगी, उस समय की परिस्थितियाँ आज से अलग रही होंगी।
परिवार की खेती, दुकान, व्यवसाय और दूसरी जिम्मेदारियों के लिए पुत्र को अधिक महत्व देने की सामाजिक सोच रही होगी।
बेटियों को शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर भी आज की तरह उपलब्ध नहीं थे।
लेकिन आज समय बदल चुका है।
आज बेटियाँ शिक्षा, खेल, विज्ञान, चिकित्सा, न्यायपालिका, प्रशासन, पत्रकारिता, व्यवसाय
और सार्वजनिक जीवन सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी योग्यता सिद्ध कर रही हैं।
इसलिए मैं बेटा और बेटी में यह तुलना भी नहीं करना चाहता कि कौन बड़ा है या कौन बेहतर है।
दोनों संतान हैं।
माता-पिता की सेवा कौन करेगा और समाज में कौन अच्छा कार्य करेगा, यह उसका लिंग नहीं बल्कि उसके संस्कार, शिक्षा, कर्म और हृदय का भाव तय करता है।
यह विचार नया नहीं—Vighnaharta अभियान से जुड़ी यात्रा
गणेश आरती को मानव सेवा से जोड़ने की यह सोच मेरे लिए केवल एक वर्ष का विषय नहीं है।
हमारे Vighnaharta अभियान में वर्षों से आरती की पंक्तियों को वास्तविक मानव सेवा से जोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है।
यदि हम आरती में “अंधन को आँख देत” कहते हैं, तो किसी जरूरतमंद को दृष्टि दिलाने में सहयोग करने वाला व्यक्ति उसके जीवन में विघ्नहर्ता बन सकता है।
इसी प्रकार आरती के दूसरे भावों को भी मानव सेवा से जोड़ा जा सकता है।
▶ KrishnaGuruji.com पर Vighnaharta एवं सेवा अभियान देखें
Amar Ujala 2024 में “बाँझन को गर्भ देत” का संदर्भ
यह भाव सार्वजनिक रूप से भी पहले सामने आ चुका है। 4 सितंबर 2024 को Amar Ujala में प्रकाशित Vighnaharta
अभियान की रिपोर्ट में महिलाओं को मातृत्व का सुख दिलाने की सेवा को “बाँझन को गर्भ देत” के भाव से जोड़ा गया था।
▶ Amar Ujala 2024 की रिपोर्ट पढ़ें
Amar Ujala 2025 में “गर्भ देत” की अपील
23 अगस्त 2025 को Amar Ujala में प्रकाशित समाचार में मेरी यह अपील स्पष्ट रूप से सामने आई
कि गणेश आरती में “बाँझन को पुत्र देत” के स्थान पर “बाँझन को गर्भ देत” गाया जाए।
▶ Amar Ujala 2025 में Krishna Guruji की अपील पढ़ें
Vighnaharta Award 2025 में भी यही भाव
6 सितंबर 2025 को Amar Ujala में प्रकाशित Vighnaharta Award की रिपोर्ट में भी “बाँझन को गर्भ देत” सेवा श्रेणी का उल्लेख किया गया।
मेरे लिए इसका उद्देश्य यही है कि आरती केवल हमारे होंठों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका भाव हमारे व्यवहार और मानव सेवा में भी दिखाई दे।
▶ Vighnaharta Award 2025 – Amar Ujala रिपोर्ट
गणेश उत्सव 2026 पर सभी गणेश प्रेमियों से मेरा निवेदन
इस गणेश उत्सव जब आपके घर में गणेश आरती हो और यह पंक्ति आए, तो एक बार उस बच्ची के प्रश्न को याद कीजिए—
“गुरुजी, पुत्र क्यों? पुत्री क्यों नहीं?”
और फिर प्रेम और श्रद्धा से गाइए—
“अंधन को आँख देत,
कोढ़िन को काया,
बाँझन को गर्भ देत,
निर्धन को माया।”
“पुत्र” नहीं—“गर्भ।”
शायद हम केवल एक शब्द बदल रहे हैं, लेकिन उस एक शब्द से अपनी बेटियों को बहुत बड़ा संदेश दे सकते हैं—
“बेटी, हमारी प्रार्थना में भी तुम्हारा स्थान उतना ही है जितना बेटे का।”
प्रार्थना संतान की हो, उसके लिंग की नहीं।
जीवन आपका, सुझाव मेरा।
🙏 जय श्री गणेश
Krishna Kant Mishra (Krishna Guruji)
Author of Kaliyug Puran
Spiritual Mentor, Yoga Teacher & Humanitarian
KrishnaGuruji.com
Related Reading
▶ गणेश जी को हाथी का सिर क्यों लगाया गया? | Shiv Puran & Kaliyug Puran
▶ Krishna Guruji के Kaliyug Puran एवं Spiritual Wisdom Blogs

