क्या श्राद्ध के भोजन में खीर-पूड़ी अनिवार्य है? | कलियुग पुराण की दृष्टि से Krishna Guruji

श्राद्ध में खीर-पूड़ी की अनिवार्यता पर सवाल उठाते Krishna Guruji; साथ में खीर, पूड़ी और भोजन की थाली
क्या श्राद्ध के भोजन में खीर-पूड़ी अनिवार्य है? Krishna Guruji की कलियुग पुराण दृष्टि से जानें, पितृपक्ष में भोजन पाने वाले की ज़रूरत और सेवा का भाव क्यों महत्वपूर्ण है

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कलियुग पुराण की दृष्टि से — कृष्णा गुरुजी

पितृपक्ष आते ही कई घरों में श्राद्ध का भोजन  में  खीर-पूड़ी बनती है। ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है।

भोजन के अंश अन्य जीवों के लिए भी रखे जाते हैं।

मैं इस परंपरा को प्रणाम करता हूँ। फिर भी मेरे मन में एक प्रश्न है: क्या श्राद्ध के भोजन में खीर-पूड़ी अनिवार्य है?

मेरे कलियुग पुराण का उद्देश्य पुरानी परंपराओं को आज के जीवन से जोड़ना है।

 

पितृपक्ष जो उस समय प्रासंगिक था, उसे

आज की परिस्थिति में भी परखना चाहिए। श्रद्धा का भाव जीवित रहे। साथ ही, जिसे भोजन मिले, उसकी आवश्यकता भी देखी जाए।

श्राद्ध का भोजन में खीर-पूड़ी बनाने का प्रचलन क्यों है?

पहले घरों में दूध से खीर बनती थी। चावल और दूध का यह भोजन कई परिवारों को प्रिय था। लोग पितरों की पसंद के पकवान भी बनाते थे।

समय के साथ खीर-पूड़ी बहुत से घरों में श्राद्ध के भोजन का हिस्सा बन गई।

लेकिन प्रचलन और अनिवार्यता में अंतर है। स्कंद पुराण के नागर खंड, अध्याय २१९ में एक विशेष तिथि और

नक्षत्र के प्रसंग में खीर का उल्लेख है। वहाँ से यह नियम नहीं निकलता कि हर श्राद्ध में खीर-पूड़ी दोनों बनानी होंगी।

इसी प्रकार, मनुस्मृति ३.८२ में अन्न के साथ जल, दूध, कंद और फल का भी उल्लेख मिलता है।

इसलिए मेरा प्रश्न है: हम एक ही पकवान पर इतना आग्रह क्यों करें?

क्या श्राद्ध में खीर-पूड़ी सबको खिलाना उचित है?

आज किसी व्यक्ति को शक्कर से परहेज़ हो सकता है। किसी बुजुर्ग को हल्का भोजन खाने की सलाह मिली हो सकती है।

किसी अन्य व्यक्ति के लिए गेहूँ से बना भोजन उपयुक्त न हो। ऐसे में भोजन का स्वरूप उस व्यक्ति के अनुसार बदलना चाहिए।

यदि आप वृद्धाश्रम में भोजन करा रहे हैं, तो वहाँ रहने वालों से पूछिए। वे क्या खाते हैं? उन्हें क्या पसंद है? किन चीज़ों से उन्हें परहेज़ है?

खीर उनके लिए ठीक है, तो खीर बनवाइए। उन्हें सादा भोजन चाहिए, तो सादा भोजन बनवाइए।

श्राद्ध का भोजन पाने वाले की ज़रूरत से बड़ा कोई पकवान नहीं होना चाहिए।

आज भोजन और स्वास्थ्य पर हमारी समझ भी बढ़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन शक्कर का सेवन सीमित रखने की सलाह देता है।

इसलिए जिसे मीठे से परहेज़ है, उस पर परंपरा के नाम पर मीठा खाने का आग्रह क्यों करें?

श्राद्ध के भोजन के अंश अनेक जीवों तक क्यों पहुँचते हैं?

हमारे यहाँ भोजन का हिस्सा ब्राह्मण या अभ्यागत के लिए रखा जाता है।

गाय, कौवे, कुत्ते और छोटे जीवों के लिए भी अन्न रखा जाता है।

मैं इसके पीछे हमारे ऋषि-मुनियों की व्यापक दृष्टि देखता हूँ।

पक्षी आकाश में रहते हैं। चींटियाँ और कीड़े धरती पर रहते हैं। गाय और श्वान हमारे आसपास रहते हैं।
भिक्षुक या ज़रूरतमंद व्यक्ति भी हमारे बीच ही है।

पितरों की स्मृति में बना भोजन इन सब तक पहुँचे।

मनुस्मृति ३.९२ में पक्षियों, कुत्तों और छोटे जीवों के लिए अन्न रखने का उल्लेख मिलता है।

इसे सभी जीवों के प्रति कृतज्ञता से जोड़कर देखना मेरी कलियुग पुराण की दृष्टि है।

आज किसी शहर में कौवा आसानी से न दिखे, तो परंपरा का भाव मत भूलिए। पक्षियों और

 

 

दूसरे जीवों के लिए अन्न रखने का भाव आगे बढ़ाइए।

ब्राह्मण भोजन कराएँ, तो श्रद्धा का भाव भी देखें

पुराने समय में भिक्षा पर निर्भर ब्राह्मण को भोजन कराना सम्मान और सहायता का रूप था।

आज भी कोई आपके पितरों के प्रति भाव लेकर आए

, तो उसे श्रद्धा से भोजन कराइए।

लेकिन जजमान को यह भी देखना चाहिए कि भोजन केवल औपचारिकता न बन जाए।

यदि कहीं दक्षिणा की अपेक्षा भाव पर भारी पड़ रही है

, तो उस पर विचार कीजिए। मेरे लिए श्राद्ध में भाव सबसे पहले आता है।

मैं ब्राह्मण भोजन की परंपरा का अपमान नहीं करता। मैं इतना कहता हूँ कि किसी भूखे व्यक्ति को भोजन देना भी महत्वपूर्ण है।

जिसकी बड़ी आवश्यकता दवा है, उसकी दवाइयों में सहायता करना भी सेवा है।

पितरों की स्मृति में भोजन के साथ दवाइयों की सहायता करें

माता-पिता या दादा-दादी की तिथि आए, तो उनकी स्मृति में किसी ज़रूरतमंद का सहारा बनें।

 

आप किसी वृद्धाश्रम या अनाथालय में भोजन करा सकते हैं। वहाँ के लोगों के अनुरूप भोजन बनवाएँ।

यदि आपके माता-पिता का निधन किसी बीमारी से हुआ था, तो उस बीमारी से जूझ रहे गरीब मरीजों की सहायता करें।

अपनी क्षमता के अनुसार किसी

अस्पताल में दवाइयों का सहयोग दें। किसी परिवार के लिए दवाइयों की सहायता,

भोजन से भी बड़ी आवश्यकता हो सकती है।

मैं चाहता हूँ कि आज की व्यस्त युवा पीढ़ी भी पितृपक्ष का भाव आगे ले जाए। हर परिवार अपनी क्षमता के
अनुसार सेवा का रास्ता चुन सकता है।

यही बात मैंने अज्ञात दिवंगत लोगों के सम्मान पर अपने लेख में भी साझा की है।

श्राद्ध का भोजन  में खीर-पूड़ी से बढ़कर क्या है?

मेरे लिए उत्तर है: श्रद्धा, कृतज्ञता और सामने वाले की आवश्यकता। खीर-पूड़ी बनाना चाहें, तो बनाइए।

लेकिन उसे हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य भोजन मत मानिए।

पितृपक्ष को अज्ञात भय का समय भी मत बनाइए। अपने माता-पिता को याद कीजिए। उन्होंने जीवन भर आपकी प्रसन्नता चाही थी।

उनकी स्मृति में किसी भूखे को भोजन दें। किसी रोगी की दवाइयों में सहायता करें। अन्न का एक अंश दूसरे जीवों तक भी पहुँचाएँ।

परंपरा का भाव तभी आगे जाएगा, जब नई पीढ़ी उसे अपने जीवन में निभा पाएगी। मेरे लिए कलियुग में श्राद्ध का यही प्रश्न है:

आज आपके पितरों की याद से किसे राहत मिली?

त्योहारों को सेवा से जोड़ने पर मेरे अन्य विचार कलियुग में चातुर्मास की प्रासंगिकता

और कृष्णा गुरुजी की सेवा पहलों में भी पढ़ सकते हैं।

— कृष्णा गुरुजी
अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक

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