कलियुग पुराण की दृष्टि से — कृष्णा गुरुजी
क्या आपने रुद्राभिषेक के मंत्रों का अर्थ समझा है?
श्रावण माह चल रहा है। मंदिरों और घरों में जगह-जगह रुद्राभिषेक हो रहे हैं। आपमें से बहुत से लोग श्रद्धा के साथ इनमें सम्मिलित भी होते होंगे। लेकिन क्या आप रुद्राभिषेक के 11 अनुवाकों का अर्थ जानते हैं?
यजमान पूजा में बैठते हैं। शिवलिंग पर जलधारा बहती रहती है। वहीं, पंडित जी संस्कृत में वैदिक मंत्रों का पाठ करते हैं। वातावरण भक्तिमय हो जाता है। हम हाथ जोड़ते हैं और भगवान शिव का स्मरण करते हैं। अंत में प्रसाद लेकर घर लौट आते हैं।
क्या कभी आपके मन में यह जिज्ञासा उठी है?
पंडित जी जिन मंत्रों का पाठ कर रहे हैं, उनका अर्थ क्या है? उन मंत्रों से हम किससे और क्या प्रार्थना कर रहे हैं? क्या यह केवल भगवान शिव को प्रसन्न करने की पूजा है? अथवा इसके भीतर हमारे जीवन और प्रकृति के लिए भी कोई संदेश छिपा है?
श्रद्धा के साथ समझ क्यों जरूरी है?
आज हम AI और आधुनिक विज्ञान के युग में जी रहे हैं। एक छोटी-सी बात के लिए भी मोबाइल पर खोज करते हैं। फिर इन वैदिक मंत्रों का भाव जानने की कोशिश क्यों न करें?
सामान्यतः हम आमंत्रण मिलने पर रुद्राभिषेक में चले जाते हैं। पूजा में बैठते हैं, मंत्र सुनते हैं और जल चढ़ाते हैं। फिर प्रसाद लेकर घर लौट आते हैं। श्रद्धा होना बहुत सुंदर बात है। हालांकि, श्रद्धा के साथ समझ भी जुड़नी चाहिए। तब वही पूजा हमारे जीवन को भीतर से बदल सकती है।
आखिर रुद्राभिषेक में किसकी पूजा होती है? यजमान कौन होता है? शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाया जाता है? मंत्रों को सुनने और उनके भाव को जीवन में उतारने से हमें क्या लाभ मिलता है? श्रीरुद्रम् के 11 अनुवाक हमें मनुष्य, समाज और प्रकृति के बारे में क्या सिखाते हैं?
कल हमारा बच्चा हमसे पूछ सकता है—“रुद्राभिषेक क्या है? इन मंत्रों का अर्थ क्या है?” तब क्या हमारे पास सरल उत्तर होगा?
कृष्णा गुरुजी कहते हैं—मंत्र केवल संस्कृत के कुछ शब्दों का उच्चारण नहीं है। सरल भाषा में “मंत्र” यानी मन का तंत्र है। यह मन को नियंत्रित करके सही दिशा में ले जाता है। मंत्र सुनकर हमारे विचार और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आना चाहिए। अन्यथा, हमने केवल उच्चारण सुना है। हमने उसका वास्तविक संदेश नहीं समझा।
इसी जिज्ञासा के साथ श्रीरुद्रम् के 11 अनुवाकों को समझते हैं। इसके लिए हम सरल मानवीय भाषा का उपयोग करेंगे। साथ ही, आज के जीवन से जुड़े उदाहरण भी देखेंगे। फिर अगली बार मंत्र केवल कानों तक सीमित नहीं रहेंगे। वे आपके मन और जीवन तक भी पहुंचेंगे।
श्रीरुद्रम् का ग्रंथ-स्थान
श्रीरुद्रम् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता का अंश है। सटीक रूप से, नमकम् इसी संहिता के चतुर्थ काण्ड के पंचम प्रश्न में आता है। वहीं, चमकम् चतुर्थ काण्ड के सप्तम प्रश्न में आता है। इसे “रुद्रप्रश्नः” भी कहा जाता है। नमकम् और चमकम्—दोनों में 11-11 अनुवाक हैं। आप भारत सरकार के वैदिक हेरिटेज पोर्टल पर तैत्तिरीय संहिता के बारे में अधिक जान सकते हैं।
पाठ-पद्धति परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है। एक प्रचलित विधि में नमकम् के साथ चमकम् का एक अनुवाक जोड़ा जाता है। इस युग्म को 11 बार दोहराया जाता है। तब एक “रुद्रम्” या “एकादशिनी” पूर्ण होती है। इसे सामान्यतः लघुरुद्र कहा जाता है। इसी क्रम को 11 बार करने पर महारुद्र होता है। वहीं, 11×11 बार करने पर अतिरुद्र होता है। हालांकि, अलग संप्रदायों में पद्धति और नामों में कुछ भिन्नता मिल सकती है।
नमकम् में बार-बार “नमः” आता है। इसका शाब्दिक अर्थ है—प्रणाम या झुकना। भाव की दृष्टि से यह अहंकार छोड़ने का संदेश देता है। चमकम् में बार-बार “च मे” आता है। इसका अर्थ है—”और मुझे यह भी प्राप्त हो।” इसमें स्वास्थ्य, अन्न, ज्ञान और सद्बुद्धि की प्रार्थना है। साथ ही, प्राणशक्ति, परिवार, प्रकृति और संतुलित जीवन की कामना भी है।
जिस समय ये मंत्र संकलित हुए, तब वैदिक ज्ञान संस्कृत में संरक्षित था। आज नई पीढ़ी हिंदी और अंग्रेजी अधिक समझती है। इसलिए मंत्रों का उच्चारण सुरक्षित रखना जरूरी है। साथ ही, उनका भाव भी बच्चों तक उनकी भाषा में पहुंचना चाहिए।
रुद्राभिषेक के 11 अनुवाकों का सरल संदेश
अब श्रीरुद्रम् के नमकम् के 11 अनुवाक क्रमवार समझते हैं। पहले उनकी विषय-वस्तु जानेंगे। फिर कलियुग पुराण की दृष्टि से उनका भाव समझेंगे।
1. पहला अनुवाक — क्रोध को सही दिशा देना
अनुवाक में क्या है: पहला अनुवाक रुद्र के क्रोध, बाण और धनुष को नमन करता है। उनकी दोनों भुजाओं को भी प्रणाम किया गया है। फिर उनके कल्याणकारी और अघोर रूप की प्रार्थना की गई है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: क्रोध अपने आप में बुरा नहीं है। लेकिन उसका प्रयोग किसी को पीड़ा देने में नहीं, अन्याय और अपने दुर्गुणों को समाप्त करने में होना चाहिए। अपने भीतर की उग्रता को मानव कल्याण की शक्ति बनाना ही पहले अनुवाक का भाव-संदेश माना जा सकता है।
2. दूसरा अनुवाक — प्रकृति और कर्मयोगियों का सम्मान
अनुवाक में क्या है: इसमें रुद्र को सेनापति और दिशाओं के स्वामी के रूप में नमन किया गया है। साथ ही, वृक्षों, पशुओं, मार्गों और खेतों में भी उन्हें देखा गया है। वन, व्यापारी और औषधियां भी इसी भाव में शामिल हैं।
कलियुग पुराण की दृष्टि: शिव केवल मंदिर में नहीं हैं। वे किसान के परिश्रम और श्रमिक के पसीने में भी हैं। वे पशु के जीवन और वृक्ष की छाया में भी हैं। इसलिए प्रत्येक कर्मयोगी का सम्मान करना शिव को प्रणाम करना है।
3. तीसरा अनुवाक — हर मनुष्य में परिवर्तन की संभावना
अनुवाक में क्या है: इसमें चोरों, ठगों और रात्रि-चरों में भी रुद्रतत्त्व देखा गया है। पर्वत-वासियों और धनुर्धरों को भी नमन किया गया है। इस प्रकार, उपेक्षित लोगों में भी रुद्रतत्त्व स्वीकार किया गया है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: किसी व्यक्ति को उसके बाहरी रूप से छोटा नहीं समझना चाहिए। काम या सामाजिक स्थिति भी सम्मान का आधार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति में परिवर्तन और दिव्यता की संभावना है।
4. चौथा अनुवाक — कोई काम छोटा नहीं
अनुवाक में क्या है: इसमें सेनाओं और रथकारों को नमन किया गया है। कुम्हार, लोहार, बढ़ई और मछुआरे भी शामिल हैं। धनुष-बाण बनाने वालों और शिकारियों को भी प्रणाम किया गया है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: समाज किसी एक व्यक्ति से नहीं चलता। प्रत्येक कौशल और प्रत्येक ईमानदार कर्म का अपना महत्व है। किसी व्यक्ति या उसके काम को छोटा समझना, सृष्टि की व्यवस्था को छोटा समझना है।
5. पांचवां अनुवाक — नाम और रूपों में एकता
अनुवाक में क्या है: इसमें भव, रुद्र, शर्व और पशुपति जैसे नाम आते हैं। नीलग्रीव, कपर्दी और गिरिश को भी नमन किया गया है। छोटे-बड़े और वृद्ध-युवा जैसे विपरीत रूपों में भी रुद्र को देखा गया है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: ईश्वर के अनेक नाम और रूप एक ही सत्य के अलग पक्ष हैं। इसलिए जीवन के परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए। पुरानी आदतों और अहंकार का अंत जरूरी है। तभी अच्छे जीवन का आरंभ होता है।
6. छठा अनुवाक — छोटे-बड़े सभी में शिव
अनुवाक में क्या है: इसमें ज्येष्ठ, कनिष्ठ और मध्यम रूपों को नमन किया गया है। पहले और बाद में जन्मे लोग भी शामिल हैं। उपजाऊ तथा बंजर भूमि में भी रुद्र को देखा गया है। शूरवीरों और कवचधारियों को भी प्रणाम है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: बच्चा, युवा और बुजुर्ग—सभी समान रूप से सम्मान के अधिकारी हैं। अनुभव का भी महत्व है और नई पीढ़ी के नए विचारों का भी। दोनों के समन्वय से समाज आगे बढ़ता है।
7. सातवां अनुवाक — जल और जीवन के प्रवाह की रक्षा
अनुवाक में क्या है: इसमें नदियों, मार्गों, तालाबों और कुओं को नमन किया गया है। वर्षा, बादल, बिजली और आंधी में भी रुद्र को देखा गया है। मनुष्य के निवास-स्थानों में भी वही रुद्रतत्त्व है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: जल केवल शिवलिंग पर चढ़ाने की सामग्री नहीं है। जल जीवन का आधार है। हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। इसलिए नदियों को प्रदूषित करना या जल व्यर्थ बहाना उचित नहीं है।
8. आठवां अनुवाक — शक्ति के साथ मंगल भाव
अनुवाक में क्या है: इसमें सोम, रुद्र, उग्र और भीम जैसे तीव्र रूप आते हैं। वहीं, शम्भु, शंकर, शिव और “शिवतर” जैसे मंगलकारी नाम भी आते हैं। “शिवाय च शिवतराय च” में “नमः शिवाय” का मूल भाव निहित है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: जीवन में शक्ति आवश्यक है। हालांकि, शक्ति के साथ करुणा और संयम भी होना चाहिए। अधिकार के साथ उत्तरदायित्व और सामर्थ्य के साथ सेवा का भाव ही शिवत्व है।
9. नौवां अनुवाक — हर स्थान में शिव
अनुवाक में क्या है: इसमें रेगिस्तान, मार्ग, बस्तियां और गोशालाएं आती हैं। घर, शयन-स्थान, कंदराएं और हृदय भी शामिल हैं। सूखी तथा हरी-भरी भूमि में उपस्थित रुद्र को भी नमन किया गया है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: प्रत्येक स्थान में शिव हैं। इसलिए घर, सड़क, नदी और जंगल को स्वच्छ रखना भी शिव पूजा है। केवल मंदिर की स्वच्छता पर्याप्त नहीं है। पूरी प्रकृति शिव का मंदिर है।
10. दसवां अनुवाक — परिवार और प्रत्येक जीव की रक्षा की प्रार्थना
अनुवाक में क्या है: यह अनुवाक सीधी प्रार्थना के रूप में है। इसमें बड़ों, बच्चों और माता-पिता की रक्षा मांगी गई है। गायों, घोड़ों और वीर पुरुषों की सुरक्षा भी मांगी गई है। गांव के मनुष्य और पशु निरोग रहें, यही प्रार्थना है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: सच्ची प्रार्थना केवल अपने परिवार के लिए नहीं होती। हमारी कामना प्रत्येक परिवार और जीव तक पहुंचनी चाहिए। तब वह विश्व कल्याण की प्रार्थना बनती है।
11. ग्यारहवां अनुवाक — पृथ्वी से आकाश तक शिव, और मृत्युंजय मंत्र
अनुवाक में क्या है: अंतिम अनुवाक पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश की रुद्र-शक्तियों को नमन करता है। दसों दिशाओं में उपस्थित शक्तियों को भी प्रणाम किया गया है। इसके अंत में प्रसिद्ध मृत्युंजय मंत्र आता है—”त्र्यम्बकं यजामहे…।” इसमें दीर्घायु और मृत्युभय से मुक्ति की प्रार्थना है। अग्नि, जल और औषधियों में व्याप्त रुद्रतत्त्व को भी नमन किया गया है।
कलियुग पुराण की दृष्टि: मनुष्य इस ब्रह्मांड का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक छोटा-सा अंश है। प्रकृति की शक्तियों पर विजय प्राप्त करना नहीं, उनके साथ संतुलन बनाकर जीना मानवता की सुरक्षा का मार्ग है।
नमकम् और चमकम् का सरल भाव
नमकम् हमें झुकना सिखाता है। वह कहता है—अपने अहंकार को छोड़ो और सृष्टि के प्रत्येक रूप में शिवतत्त्व को प्रणाम करो।
चमकम् जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं और शक्तियां मांगना सिखाता है। हालांकि, इसके साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है। जो कुछ मिले, उसका सदुपयोग करें। उसका उपयोग परिवार, समाज, प्रकृति और मानवता के कल्याण में भी हो।
नमकम् का भाव है—मैं अहंकार छोड़ता हूं। चमकम् का भाव है—मुझे जो मिले, उसका सदुपयोग करने की बुद्धि भी मिले।
रुद्राभिषेक में जल चढ़ाने का भाव
भगवान शिव को हमारे जल की आवश्यकता नहीं है। शिवलिंग पर निरंतर बहती जलधारा हमें अपने भीतर झांकने का संकेत देती है।
जल चढ़ाते समय हमारा भाव होना चाहिए:
- मेरा क्रोध शीतल हो।
- मेरा अहंकार गलकर बह जाए।
- मेरे विचार स्वच्छ हों।
- मेरी वाणी मधुर बने।
- मेरे कर्म प्रकृति और मानवता के हित में हों।
रुद्राभिषेक प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाला अनुष्ठान है। यह भीतर सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव कराता है। इसका उद्देश्य केवल शिवलिंग का अभिषेक करना नहीं है। यह अपने मन, विचार और व्यवहार का अभिषेक भी है।
कलियुग पुराण का अंतिम संदेश
यह ब्रह्मांड पांच तत्वों से बना है। ये तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। हमारा शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इसलिए मनुष्य और ब्रह्मांड एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
इन पांचों तत्वों में शिवतत्त्व उपस्थित है। वही शिवतत्त्व हमारे भीतर चल रही श्वास है। श्वास है तो शिव हैं। श्वास नहीं तो यही शरीर शव बन जाता है।
पृथ्वी हमें आधार देती है। जल जीवन देता है। अग्नि ऊर्जा देती है। वायु श्वास देती है और आकाश हमें अस्तित्व के लिए स्थान देता है। इन पांच तत्वों के बिना हम एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते।
इसलिए इनका संरक्षण हमारा सबसे बड़ा दायित्व है। जल बचाएं और वायु को शुद्ध रखें। पृथ्वी तथा वृक्षों की रक्षा करें। अग्नि और ऊर्जा का संयमित उपयोग करें। साथ ही, आकाश जैसी विशाल सोच रखें। यही पांच तत्वों के प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता है।
यदि हम जल व्यर्थ बहाते हैं, तो जलाभिषेक अधूरा है। यदि “नमः” बोलकर अहंकार नहीं छोड़ते, तो नमकम् अधूरा है। इसी प्रकार, प्रकृति और समाज को कुछ लौटाना भी जरूरी है। अन्यथा, चमकम् की हमारी प्रार्थना अधूरी है।
जल शिवलिंग पर चढ़े। साथ ही, वास्तविक अभिषेक हमारे विचारों का हो। पांचों तत्वों के प्रति कृतज्ञता रखें। उनका संरक्षण करें और प्रत्येक जीव में शिवतत्त्व का सम्मान करें। यही कलियुग पुराण की दृष्टि से सच्चा रुद्राभिषेक है।
रुद्राभिषेक से जुड़े सामान्य प्रश्न
रुद्राभिषेक के 11 अनुवाकों का अर्थ क्या है?
ये अनुवाक जीवन, प्रकृति और समाज में रुद्रतत्त्व को नमन करते हैं। इनका भाव अहंकार छोड़कर कल्याणकारी जीवन जीना है।
नमकम् और चमकम् में क्या अंतर है?
नमकम् अहंकार छोड़कर झुकना सिखाता है। वहीं, चमकम् जीवन की आवश्यक शक्तियों के लिए प्रार्थना करना सिखाता है।
शिवलिंग पर जल चढ़ाने का वास्तविक भाव क्या है?
जल शीतलता, स्वच्छता और निरंतर प्रवाह का संदेश देता है। इसलिए जलाभिषेक मन और विचारों को शुद्ध करने का प्रतीक है।
यह व्याख्या उपयोगी लगी हो तो आगे भी पढ़ें। आप कृष्णा गुरुजी की आध्यात्मिक यात्राओं और सेवाकार्यों के बारे में जान सकते हैं।
—कृष्णा गुरुजी कृष्णानंद मिश्रा लेखक, कलियुग पुराण
संपादकीय टिप्पणी: प्रत्येक अनुवाक की वैदिक विषय-वस्तु पहले संक्षेप में दी गई है। इसका आधार कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता है। “कलियुग पुराण की दृष्टि” वाला भाग आधुनिक भाव-व्याख्या है। इसे शब्दशः अनुवाद न माना जाए।

