नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान | Kaliyug Puran

नाभि चक्र ध्यान के लिए माँ चंद्रघंटा, नाभि पर सुनहरे प्रकाश वाली ध्यान मुद्रा और नमस्ते करते कृष्णा गुरुजी।
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा के स्मरण के साथ करें नाभि चक्र ध्यान। कलियुग पुराण की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी समझाते हैं ईर्ष्या और तुलना से अपनत्व की ओर बढ़ने का संदेश। वीडियो के साथ जानें ध्यान की सरल विधि और आत्मचिंतन का महत्व।

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नाभि चक्र ध्यान  Navel Chakra Meditation  इस सत्र का मुख्य विषय है।

कलियुग पुराण se
नवरात्रि तीसरा दिन हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है।
माँ चंद्रघंटा ध्यान के इस अभ्यास को कृष्णा गुरुजी
कलियुग पुराण की दृष्टि से समझाते हैं।
यह नवरात्रि ध्यान आत्मचिंतन और अपनत्व का निमंत्रण है।
अंग्रेज़ी में इसे Navel Chakra Meditation कहा जाता है।

क्या किसी की सफलता देखकर आपका मन बेचैन होता है?
क्या दूसरों की प्रशंसा सुनना कभी कठिन लगता है?
ऐसे भाव आएँ, तो उन्हें पहचानना पहला कदम है।
इसके बाद हम अपने व्यवहार पर विचार कर सकते हैं।

इस सत्र में कृष्णा गुरुजी एक प्रश्न उठाते हैं।
क्या हम दूसरों की खुशी में खुश हो पाते हैं?
इसी प्रश्न के साथ ध्यान की यात्रा आगे बढ़ती है।

नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा का आंतरिक संदेश

कलियुग पुराण se

माँ चंद्रघंटा के स्मरण के साथ यह सत्र भीतर की शक्ति पर ध्यान देता है।


>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>कृष्णा गुरुजी देवी के स्वरूप को हमारे भावों से जोड़ते हैं।
उनके अनुसार, साधना में अपने स्वभाव को देखना भी आवश्यक है।

हम उत्साह, रचनात्मकता और अपनत्व को कैसे स्थान देते हैं?
साथ ही, ईर्ष्या या तुलना आने पर क्या करते हैं?
ये प्रश्न ध्यान को दैनिक जीवन से जोड़ते हैं।

यहाँ देवी स्वरूपों और चक्रों का संबंध कृष्णा गुरुजी की
आध्यात्मिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत है।
इसे सभी परंपराओं की एक समान मान्यता न सम
झें।

नाभि चक्र ध्यान  Navel Chakra Meditation में

अपने भावों को देखें</h2>

इस अभ्यास में ध्यान नाभि के क्षेत्र पर लाया जाता है।
फिर मन में उठते भावों को देखा जाता है।
उद्देश्य किसी भावना को जबरन दबाना नहीं है।
पहले उसे बिना निर्णय किए पहचानना

है।</p>

उदाहरण के लिए, किसी की उपलब्धि सुनकर तुलना उठ सकती है।
ऐसे में कुछ पल रुकें।
स्वयं से पूछें कि यह बेचैनी किस बात की है।
क्या मुझे पीछे छूटने का डर

है?
या मैं भी सराहना चाहता हूँ?</p>

इस तरह आत्मचिंतन के लिए जगह बनती है।
धीरे-धीरे दूसरों को समझने का अवसर भी मिलता है।
यही इस सत्र में अपनत्व की ओर बढ़ने का संदेश

है।

उत्साह से अपनत्व तक: सत्र के तीन चरण कलियुग पुराण se</h2>

मुख्य अभ्यास नाभि चक्र पर केंद्रित है।
हालांकि, इसकी शुरुआत मूलाधार से होती है।
इसके बाद ध्यान स्वाधिष्ठान और फिर नाभि पर आता

है।

1. मूलाधार: उत्साह के पलों का स्मरण</h3>

पहले शरीर और आसन के स्पर्श को महसूस करें।
फिर मूलाधार पर सहज ध्यान लाएँ।
इस सत्र में इसे माँ शैलपुत्री के स्मरण से जोड़ा गया

है।</p>

अब जीवन का कोई उत्साह भरा पल याद करें।
वह छोटी उपलब्धि भी हो सकती है।
उस समय की खुशी को सहजता से महसूस क

रें।

2. स्वाधिष्ठान: अपनी रचनात्मकता को याद करें</h3>

इसके बाद ध्यान स्वाधिष्ठान की ओर ले जाएँ।
सत्र में यह चरण माँ ब्रह्मचारिणी के स्मरण से जुड़ा है।
यहाँ अपने रचनात्मक पलों को याद करने का सुझाव दिया गया

है।</p>

शायद आपने कोई गीत लिखा हो।
किसी समस्या का नया समाधान खोजा हो।
या अपने हाथों से कुछ सुंदर बनाया हो।
इन अनुभवों को याद क

रें।

3. नाभि चक्र: अपनत्व की ओर बढ़ें</h3>

अब अपना ध्यान धीरे से नाभि पर लाएँ।
माँ चंद्रघंटा का स्मरण करें।
साथ ही, अपने भीतर उठते विचारों को दे

खें।

क्या किसी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या है?
क्या उसकी सफलता स्वीकार करना कठिन लगता है?
इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से खोजें।
फिर उसके कल्याण की भावना का अभ्यास करें।

नाभि चक्र ध्यान कैसे करें?

इस सत्र के आधार पर अभ्यास का सरल क्रम नीचे दिया है।
इसे अपनी सहजता के अनुसार करें।

    1. कुर्सी या सुविधाजनक आसन पर बैठें।
    2. आरामदायक लगे, तो आँखें बंद करें।
    3. शरीर और आसन के स्पर्श को महसूस करें।
    4. साँस को सहज रहने दें।
    5. उत्साह और रचनात्मकता से जुड़े पलों को याद करें।
    6. अब धीरे से ध्यान नाभि के क्षेत्र पर लाएँ।
    7. माँ चंद्रघंटा का स्मरण करें।
    8. विचारों और भावों को साक्षी भाव से देखें।
    9. अपने और दूसरों के कल्याण की भावना रखें।
    10. पूर्णता महसूस होने पर धीरे से आँखें खोलें।
    11. </ol

>मन भटके, तो स्वयं से नाराज़ न हों।
बस ध्यान वापस ले आएँ।
किसी खास अनुभव की अपेक्षा रखना आवश्यक नहीं है।
असहजता हो, तो अभ्यास रोककर सहज बै

    1. ठें।

“पूजन अर्चन मैं ना जानूँ, जानूँ तेरा ध्यान”

“पूजन अर्चन मैं ना जानूँ, जानूँ तेरा ध्यान।”

</blockquote>सत्र में यह भावपूर्ण पंक्ति भी साझा की गई है।
कृष्णा गुरुजी ने गीत के रचनाकार अपने बड़े भाई
श्री चंद्रकांत मिश्रा को बताया

है।</p>इसका भाव सरल है।
साधक माँ को ध्यान में याद करता है।
साथ ही, सबके कल्याण की कामना करता है।
इस तरह साधना में करुणा को भी स्थान मिलता

है।

ध्यान का संदेश व्यवहार में कैसे लाएँ?

ध्यान के बाद अपने व्यवहार पर भी गौर करें।किसी की उपलब्धि पर उसे बधाई दें।

प्रशंसा करते समय तुलना से बचने का प्रयास करें।
दूसरों की बात धैर्य से सुनें।

रात को कुछ पल आत्मचिंतन करें।
आज कब मन में ईर्ष्या आई?
कब आपने किसी की खुशी में भाग लिया?
अगली बार आप क्या बेहतर कर सकते हैं?</p>

इस अभ्यास का उद्देश्य स्वयं को दोष देना नहीं है।
उद्देश्य अपने भावों को समझना है।
फिर छोटे कदमों से अपनत्व को व्यवहार में लाना

है।

पूरा वीडियो देखें: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान

Navel Chakra Meditation

कृष्णा गुरुजी के मार्गदर्शन में पूरा ध्यान सत्र देखें।कलियुग पुराण se
वीडियो में चर्चा और निर्देशित अभ्यास दोनों शामिल हैं।


YouTube पर पूरा नाभि चक्र ध्यान सत्र देखें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या इस वीडियो में केवल नाभि चक्र का ध्यान है?

इसका मुख्य विषय नाभि चक्र ध्यान है।

शुरुआत में मूलाधार और स्वाधिष्ठान पर भी ध्यान कराया गया है।
इसके बाद अभ्यास नाभि पर केंद्रित होता है।

क्या ध्यान में कोई विशेष अनुभूति होना जरूरी है?

नहीं। हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है।

सहज बैठना और विचारों को देखना भी अभ्यास का हिस्सा है।
किसी विशेष अनुभूति के लिए दबाव न बनाएँ।

क्या यह अभ्यास पूजा के साथ किया जा सकता है?</h3>

हाँ। अपनी आस्था के अनुसार ध्यान को स्थान दे सकते हैं।
इस सत्र में आत्मचिंतन और कल्याण की भावना पर जोर

है।

अगले सत्र का विषय क्या है?</h3>

वीडियो के अंत में अगले सत्र का विषय हृदय चक्र बताया गया है।
उसमें प्रेम की भावना पर चर्चा का संकेत दिया गया

है।

आपका अनुभव:
क्या दूसरों की खुशी में खुश होना आपको सहज लगता है?
अपना विचार नीचे कमेंट में साझा करें।

जय माता दी। Be happy, keep happy.

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