नई शुरुआत दीप जलाकर करें, फीता काटकर नहीं : कृष्णा गुरुजी
उद्घाटन केवल किसी भवन का द्वार खोलने की औपचारिकता नहीं है। वास्तव में, उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा का विचार वर्षों से समाज में प्रचलित है।
यह नई आशा, नई सोच और नए संकल्प की शुरुआत होती है। इसी संदर्भ में, फीता काटने की परंपरा के उद्घाटन में महत्व को समझना आवश्यक है।
इसलिए उद्घाटन का तरीका भी सकारात्मक और प्रेरणादायक होना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक और ‘कलियुग पुराण’ के रचयिता कृष्णा गुरुजी ने एक नया संदेश दिया है।
उनके अनुसार, उद्घाटन दीप जलाकर और फीते को सम्मानपूर्वक हटाकर किया जाना चाहिए।
इसके विपरीत, फीता काटना नई शुरुआत की भावना को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता।
उद्घाटन नई संभावनाओं का आरंभ है
विद्यालय का उद्घाटन शिक्षा की नई यात्रा शुरू करता है।
इसी प्रकार, अस्पताल का उद्घाटन सेवा और संवेदना का नया द्वार खोलता है।
इसके अलावा, उद्योग का उद्घाटन रोजगार और विकास की संभावनाएं उत्पन्न करता है।
वहीं, किसी सड़क या पुल का उद्घाटन लोगों के बीच दूरी कम करता है।
इसलिए हर उद्घाटन केवल एक कार्यक्रम नहीं होता। आज के समय में समाज में उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा लोकप्रिय हो गई है।
वास्तव में, वह भविष्य की पहली पंक्ति लिखने का महत्वपूर्ण अवसर होता है।
फीता काटने की परंपरा का इतिहास
फीता काटकर उद्घाटन करने की परंपरा भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा नहीं है। हालांकि, पश्चिमी देशों से फीता काटने की पद्धति के रूप में उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा आई है।
यह आधुनिक नागरिक और औपचारिक आयोजनों से जुड़ी व्यवस्था मानी जाती है।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इसका प्रयोग बढ़ने लगा था।
इसके बाद, बीसवीं शताब्दी में यह यूरोप और अमेरिका में अधिक लोकप्रिय हुई।
उस समय भवनों और सार्वजनिक सुविधाओं को औपचारिक रूप से खोलने के लिए फीता लगाया जाता था।
फिर, किसी प्रमुख अतिथि द्वारा कैंची से फीता काटा जाता था।
धीरे-धीरे यह तरीका विश्व के अनेक देशों तक पहुंच गया।
बाद में भारत के सरकारी, सामाजिक और व्यावसायिक कार्यक्रमों में भी इसे अपनाया गया।
हालांकि, फीता काटना किसी विशेष धर्म का धार्मिक अनुष्ठान नहीं है।
यह मुख्यतः एक आधुनिक और औपचारिक प्रतीक है। साथ ही उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा ने समारोह को खास बना दिया है।
भारतीय संस्कृति में शुभारंभ का महत्व
भारतीय संस्कृति में शुभ कार्यों की शुरुआत प्रकाश और मंगल संकल्प से होती रही है।
इसी कारण दीप प्रज्ज्वलन का विशेष महत्व माना गया है।
दीप केवल भौतिक प्रकाश देने का साधन नहीं है।
बल्कि, वह अंधकार से प्रकाश की यात्रा का प्रतीक है।
साथ ही, दीप अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का संदेश देता है।
वह निराशा से आशा और भ्रम से विवेक की ओर भी ले जाता है।
इसलिए भारतीय शुभारंभ में दीप प्रज्ज्वलन अधिक अर्थपूर्ण प्रतीक बन सकता है। फीता काटने की परंपरा और भारतीय शुभारंभ परंपरा में यह अंतर है।
इसके अतिरिक्त, मंगलाचरण और शुभ संकल्प भी समारोह को सार्थक बनाते हैं।
फीता काटने के बजाय क्या किया जाए?
कृष्णा गुरुजी ने फीता काटने के स्थान पर एक सकारात्मक विकल्प सुझाया है।
सबसे पहले, अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन किया जाए।
इसके बाद, कार्यक्रम के उद्देश्य से जुड़ा सामाजिक संकल्प लिया जाए।
फिर, प्रवेश द्वार पर लगे फीते को सम्मानपूर्वक दोनों तरफ हटा दिया जाए।
इस प्रकार मार्ग खोलकर नए कार्य का शुभारंभ किया जा सकता है, जो पारंपरिक उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा से अलग है।
इससे किसी वस्तु को काटने के बजाय रास्ता खोलने का संदेश मिलेगा।
वास्तव में, उद्घाटन का अर्थ भी नए अवसरों के द्वार खोलना है।
“उद्घाटन फीता काटने का नहीं, नई संभावनाओं का द्वार खोलने का उत्सव बने।”
हर उद्घाटन के साथ एक सामाजिक संकल्प हो
कृष्णा गुरुजी के अनुसार, हर उद्घाटन अपने उद्देश्य से जुड़ा होना चाहिए। कार्यक्रम में उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा की चर्चा भी अनेक बार होती है।
यदि विद्यालय खुल रहा है, तो शिक्षा और संस्कार का संकल्प लिया जाए।
यदि अस्पताल खुल रहा है, तो सेवा और करुणा का संकल्प हो।
इसी प्रकार, उद्योग में श्रमिक सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया जाए।
सरकारी परियोजना में पारदर्शिता और जनसेवा का संकल्प होना चाहिए।
वहीं, धार्मिक स्थल में मानवता और सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया जाए।
इस प्रकार उद्घाटन केवल फोटो खिंचवाने का अवसर नहीं रहेगा।
बल्कि, वह समाज को दिशा देने वाला प्रेरक कार्यक्रम बनेगा।
दीप और फीते को हटाने का प्रतीकात्मक संदेश
फीते को हटाना मार्ग खोलने का प्रतीक बन सकता है। साथ ही, इस नवाचार से उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा को एक नया रूप दिया जा सकता है।
इसके विपरीत, कैंची से फीता काटना केवल एक प्रचलित औपचारिकता है।
दीप जलाना सृजन, ज्ञान और आशा का संदेश देता है।
वहीं, फीता हटाना बाधाओं को सम्मानपूर्वक दूर करने का संकेत देता है।
इसलिए दोनों प्रक्रियाएं मिलकर नई शुरुआत को अधिक सार्थक बना सकती हैं।
पहले दीप का प्रकाश हो और फिर नए मार्ग का उद्घाटन हो।
परंपरा का विरोध नहीं, सकारात्मक परिवर्तन का सुझाव
कृष्णा गुरुजी ने स्पष्ट किया कि यह किसी परंपरा का विरोध नहीं है।
बल्कि, यह भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण से एक सकारात्मक विकल्प है।
समय के साथ समाज की परंपराएं बदलती और विकसित होती हैं।
इसलिए उपयोगी और प्रेरणादायक परिवर्तन को स्वीकार किया जा सकता है।
परंपरा वही जीवित रहती है, जो समाज को नया अर्थ देती है।
अतः उद्घाटन की प्रक्रिया भी समय के अनुसार अधिक सार्थक बन सकती है। वर्तमान में भारत में उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा व्यापक चर्चा का विषय है।
अमर उजाला में प्रकाशित हुआ संदेश
कृष्णा गुरुजी के इस सांस्कृतिक सुझाव को मीडिया में भी स्थान मिला है।
प्रतिष्ठित समाचार पत्र अमर उजाला ने इस विचार को विस्तार से प्रकाशित किया है।
अमर उजाला में प्रकाशित पूरी खबर यहां पढ़ें
यह मीडिया कवरेज उद्घाटन की परंपरा पर व्यापक संवाद का अवसर देती है। उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा पर भी इस संवाद में विशेष ध्यान दिया गया है।
साथ ही, यह संदेश अधिक लोगों और संस्थानों तक पहुंच सकता है।
भारत एक नई उद्घाटन परंपरा शुरू कर सकता है
भारत ने विश्व को योग, आयुर्वेद, ध्यान और शून्य का ज्ञान दिया है।
इसके अलावा, भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सार्वभौमिक संदेश भी दिया है।
अब भारत उद्घाटन की एक सकारात्मक सांस्कृतिक पद्धति भी विकसित कर सकता है।
इस पद्धति में दीप, संकल्प, सेवा और भारतीयता का सुंदर समन्वय हो।
धीरे-धीरे विद्यालय, अस्पताल और संस्थान इस तरीके को अपना सकते हैं।
इसके बाद यह पहल एक प्रेरक सामाजिक परंपरा बन सकती है। उल्लेखनीय है कि उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा सामाजिक परिवर्तन के रूप में देखी जा रही है।
कृष्णा गुरुजी का संदेश
“आइए, नई शुरुआत की पहचान कैंची नहीं, दीप का प्रकाश बनाएं।”
“पहले दीप जलाएं और फिर फीते को सम्मानपूर्वक हटाकर नया मार्ग खोलें।”
“उद्घाटन किसी वस्तु को काटने का नहीं, नई संभावनाओं को खोलने का प्रतीक बने।”
निष्कर्ष
नई शुरुआत आशा, प्रकाश और सकारात्मक संकल्प का अवसर होती है।
इसलिए उसका स्वरूप भी सृजन और मंगल का संदेश देने वाला होना चाहिए। उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा से आगे बढते हुए दीप प्रज्ज्वलन की बात समाज में हो रही है।
दीप प्रज्ज्वलन भारतीय संस्कृति के प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है।
वहीं, फीते को हटाना नए रास्ते खोलने का सकारात्मक संकेत बन सकता है।
अतः उद्घाटन दीप जलाकर और फीता सम्मानपूर्वक हटाकर किया जाए।
इस छोटी पहल से समाज में एक बड़ा सांस्कृतिक संदेश पहुंच सकता है।
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उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा कब शुरू हुई? क्या फीता काटना भारतीय परंपरा है?
दीप प्रज्ज्वलन का क्या महत्व है?
— कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक
‘कलियुग पुराण’ के रचयिता

