आज का युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और विज्ञान के युग में जी रहा है। वह ₹1,000 की वस्तु खरीदने से पहले भी उसके रिव्यू पढ़ता है। फिर उससे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह लगभग दो हजार वर्ष पुराने किसी ग्रंथ अथवा किसी राजनीतिक वक्तव्य को बिना प्रश्न किए अंतिम सत्य मान ले?
विवेकपूर्ण दृष्टि यह है कि हम मूल कथन देखें, उसका ऐतिहासिक संदर्भ समझें और यह विचार करें कि उसकी कौन-सी बातें आज मानवता, समानता और न्याय की कसौटी पर खरी उतरती हैं। मनुस्मृति को लेकर उठी हाल की राजनीतिक बहस को भी इसी दृष्टि से समझना आवश्यक है।
पुणे के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने क्या कहा?
22 अगस्त 2026 को पुणे में आयोजित महिला-केंद्रित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और अधिकारों पर बात की। उन्होंने मनुस्मृति से जुड़े उस विचार का उल्लेख किया जिसके अनुसार महिला को जीवन के अलग-अलग चरणों में पिता, पति अथवा पुत्र के अधीन बताया जाता है। राहुल गांधी ने ऐसी सोच को शर्मनाक बताते हुए कहा कि महिला किसी और की नहीं, स्वयं की है।
कार्यक्रम का मूल संदर्भ देखने के लिए राहुल गांधी की पुणे वार्ता की आधिकारिक रिकॉर्डिंग देखी जा सकती है। कार्यक्रम और वक्तव्य की स्वतंत्र समाचार कवरेज टाइम्स ऑफ इंडिया और एबीपी न्यूज़ पर भी उपलब्ध है।
महिला सम्मान और स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं
राहुल गांधी का यह संदेश उचित है कि महिला किसी पुरुष की संपत्ति नहीं है। बेटी, बहन, पत्नी अथवा मां होने के साथ-साथ वह स्वयं एक पूर्ण और स्वतंत्र व्यक्तित्व है। उसकी शिक्षा, प्रतिभा, सपने, व्यवसाय और जीवन के निर्णयों पर उसका अपना अधिकार है।
किसी भी प्राचीन कथन, परंपरा या सामाजिक व्यवस्था का प्रयोग महिला की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा को सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता। आज के भारत में समानता और स्वतंत्रता का आधार संविधान है। अतः महिला-सम्मान के प्रश्न पर हमारी स्थिति स्पष्ट और अडिग होनी चाहिए।
क्या किसी एक ग्रंथ को पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
यहां एक तार्किक प्रश्न भी उठता है: क्या महिलाओं को नियंत्रित करने वाली समस्त सामाजिक मानसिकता के लिए केवल मनुस्मृति जिम्मेदार है?
पितृसत्तात्मक व्यवस्थाएं भारत तक सीमित नहीं रही हैं। संसार की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में महिलाओं के अधिकार सीमित थे। इसलिए पूरी ऐतिहासिक समस्या को किसी एक ग्रंथ तक सीमित कर देना अत्यधिक सरलीकरण होगा। मनुस्मृति के जो विचार वर्तमान समानता और स्वतंत्रता से मेल नहीं खाते, उनकी तथ्यपूर्ण समीक्षा होनी चाहिए; लेकिन किसी चुनिंदा अंश के आधार पर पूरे ग्रंथ, धर्म अथवा परंपरा का अपमान भी उचित नहीं है।
मनुस्मृति आज भारत का कानून नहीं है
मनुस्मृति एक प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है; वह आज भारत का संविधान अथवा लागू कानून नहीं है। वर्तमान भारत संविधान से संचालित होता है, जो प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा प्रदान करता है। सामान्य भारतीय समाज भी मनुस्मृति के प्रत्येक नियम के अनुसार अपना जीवन नहीं चलाता।
संभव है कि जिस काल में मनुस्मृति की रचना हुई, उस समय की सामाजिक, पारिवारिक और प्रशासनिक परिस्थितियों में उसकी कुछ व्यवस्थाएं प्रासंगिक मानी गई हों। किंतु किसी प्राचीन काल में प्रचलित व्यवस्था का आज भी उसी रूप में प्रासंगिक होना आवश्यक नहीं है।
प्राचीन ग्रंथों की समीक्षा हो, राजनीतिक उपयोग नहीं
आध्यात्मिक चिंतक के रूप में मेरा मानना है कि किसी प्राचीन ग्रंथ का अध्ययन, शोध और तार्किक मूल्यांकन अवश्य होना चाहिए। प्रश्न पूछना धर्म का अपमान नहीं है। लेकिन किसी एक कथन को चुनकर पूरे ग्रंथ या परंपरा को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का साधन बनाना भी ज्ञान का मार्ग नहीं है।
सभी राजनीतिक दलों से निवेदन है कि वे भारत के धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों को चुनावी ध्रुवीकरण, भय अथवा सामाजिक विभाजन का माध्यम न बनाएं। महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, संपत्ति-अधिकार और समान अवसर जैसे वास्तविक विषयों पर ठोस कार्य करना कहीं अधिक आवश्यक है।
AI और विज्ञान के युग में ग्रंथों को कैसे पढ़ें?
आज का युवा किसी राजनीतिक नेता, धर्मगुरु या सोशल मीडिया पोस्ट के कहने मात्र से किसी ग्रंथ के पक्ष या विपक्ष में निर्णय नहीं करेगा। वह मूल पाठ, विश्वसनीय अनुवाद, रचनाकाल, परिस्थितियां और विभिन्न व्याख्याएं जानना चाहेगा। उसे कम-से-कम ये प्रश्न पूछने चाहिए:
- ग्रंथ किस काल और किन सामाजिक परिस्थितियों में रचा गया?
- उल्लेखित व्यवस्था का तत्कालीन उद्देश्य क्या रहा होगा?
- क्या वह विचार आज भी मानव कल्याण में सहायक है?
- क्या वह समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की कसौटी पर उचित है?
जो विचार सत्य, करुणा, संयम, न्याय और मानव कल्याण सिखाते हैं, उन्हें ग्रहण किया जा सकता है। जो व्यवस्थाएं आज समानता और मानवीय गरिमा के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें उनके ऐतिहासिक संदर्भ तक सीमित रखना चाहिए। यही विवेकपूर्ण आध्यात्मिकता है।
कृष्णा गुरुजी की कलियुग पुराण दृष्टि
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को बांटना नहीं, बल्कि उसके भीतर विवेक जगाना है। किसी ग्रंथ को आंखें बंद करके स्वीकार करना उचित नहीं; उसी प्रकार बिना सम्यक अध्ययन के उसका अपमान करना भी उचित नहीं है। कृष्णा गुरुजी के आध्यात्मिक विचारों को विस्तार से समझने के लिए कलियुग पुराण ई-बुक पढ़ें।
“ग्रंथ दीपक हो सकता है, लेकिन आंखें और विवेक हमारे अपने होने चाहिए।”
निष्कर्ष: सम्मान भी रहे और समीक्षा भी
महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और समानता का समर्थन करना आवश्यक है। साथ ही, पूरे पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता को केवल मनुस्मृति से जोड़ना अधूरा निष्कर्ष होगा। प्राचीन ग्रंथों की तार्किक समीक्षा और उनके प्रति सांस्कृतिक सम्मान परस्पर विरोधी नहीं हैं—दोनों एक साथ संभव हैं।
मनुस्मृति को न आज का कानून बनाइए और न आज की राजनीति का हथियार। उसे इतिहास और ज्ञान की दृष्टि से पढ़िए, विवेक से परखिए और मानवता के योग्य विचारों को स्वीकार कीजिए। प्राचीन ग्रंथों का अपमान करके राजनीतिक रोटियां मत सेंकिए।

