मुंह दिखाई से प्री-वेडिंग शूट तक: क्या दिखावा संस्कारों पर भारी पड़ रहा है?
पुणे का केतन अग्रवाल हत्याकांड समाज के लिए एक चेतावनी
– कृष्णा गुरुजी
सनातन संस्कृति में विवाह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि सोलह संस्कारों में से एक
महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। विवाह के सात फेरे केवल अग्नि की परिक्रमा नहीं, बल्कि विश्वास, निष्ठा, समर्पण और आजीवन साथ निभाने का संकल्प होते हैं।
मुंह दिखाई की परंपरा और बदलता विवाह
एक समय था जब विवाह के बाद मुंह दिखाई की रस्म होती थी। परिवार और समाज नई बहू का स्वागत करते थे
। उसे आशीर्वाद दिया जाता था। शगुन के साथ नए रिश्तों की शुरुआत होती थी।
उस समय विवाह का केंद्र दिखावा नहीं, बल्कि परिवार, मर्यादा और संस्कार होते थे।
समय बदला, समाज बदला और तकनीक भी बदली। आधुनिकता का स्वागत होना चाहिए,
लेकिन जब परंपराओं का स्थान केवल कैमरा, लोकेशन, महंगे कपड़े, सोशल मीडिया पोस्ट और प्री-वेडिंग शूट लेने लगें,
तब समाज को रुककर आत्मचिंतन करना चाहिए।
आज विवाह कई बार संस्कार से अधिक प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा है।
रिश्तों की गहराई से अधिक तस्वीरों की चमक पर ध्यान दिया जा रहा है।
परिवार के संवाद से अधिक सोशल मीडिया की स्वीकृति को महत्व दिया जा रहा है। यही बदलता वातावरण समाज के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
घटना से उठते सामाजिक प्रश्न
हाल ही में पुणे के चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड ने पूरे समाज को झकझोर दिया।
पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपने मार्ग पर है। अंतिम निर्णय न्यायालय को करना है। लेकिन यह घटना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी अवश्य है।
यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों,
रिश्तों में घटते विश्वास, परिवारों में कमजोर होते संवाद और संस्कारों से दूर होती पीढ़ी पर चिंतन का विषय है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम नई पीढ़ी को केवल स्वतंत्रता दे रहे हैं या उसके साथ जिम्मेदारी भी सिखा रहे हैं
? क्या हम बच्चों को आधुनिक जीवन दे रहे हैं, लेकिन संस्कारों की जड़ से दूर कर रहे हैं?
परिवार में संवाद और मार्गदर्शन
पुरानी कहावत है — “पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं।” माता-पिता अपने बच्चों के स्वभाव,
व्यवहार, आदतों और जीवन की दिशा को सबसे अधिक समझते हैं।
फिर भी कई बार मोह, सामाजिक डर या अनदेखी के कारण समय रहते आवश्यक संवाद नहीं हो पाता। यही मौन आगे चलकर संकट का कारण बन सकता है।
महाभारत में धृतराष्ट्र का पुत्र मोह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वे जानते थे कि दुर्योधन गलत मार्ग पर है, फिर भी समय रहते उसे रोक नहीं पाए।
परिणाम केवल एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का विनाश बना। आज भी जब परिवार सत्य को जानते हुए मौन रहता है
, तब उसके दुष्परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
कानून, संस्कार और परिवार की भूमिका
आज आवश्यकता केवल कानून की सख्ती की नहीं है। कानून अपराध होने के बाद सक्रिय होता है,
लेकिन संस्कार अपराध होने से पहले व्यक्ति को रोकते हैं। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर चरित्र निर्माण पर ध्यान दें,
तो अनेक दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है।
न्याय व्यवस्था का सम्मान होना चाहिए। समाज यह भी अपेक्षा करता है कि न्याय समयबद्ध और प्रभावी हो,
ताकि आम नागरिक का विश्वास बना रहे। परंतु कानून के साथ-साथ परिवार की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सच्चा प्रेम बच्चों की गलतियों को छिपाने में नहीं, बल्कि समय रहते उन्हें सही दिशा देने में है।
माता-पिता को बच्चों के केवल खर्च, पढ़ाई और करियर पर नहीं, बल्कि
उनके विचार, मित्रता, व्यवहार और संस्कारों पर भी ध्यान देना होगा।
पुणे की यह घटना समाज को यह संदेश देती है कि यदि रिश्तों में विश्वास कमजोर होगा,
परिवार में संवाद टूटेगा और जीवन से संस्कार दूर होंगे, तो आधुनिकता की चमक भी हमें सुरक्षित नहीं रख पाएगी।
अगली पीढ़ी के लिए संदेश
आइए, हम अपनी अगली पीढ़ी को केवल मोबाइल, करियर, स्वतंत्रता और आधुनिक जीवन ही नहीं,
बल्कि संस्कार, जिम्मेदारी, नैतिकता और रिश्तों की मर्यादा भी दें।
क्योंकि विवाह केवल एक आयोजन नहीं है। विवाह जीवनभर निभाया जाने वाला संस्कार है।
मुंह दिखाई से प्री-वेडिंग शूट तक की यह यात्रा तभी सार्थक होगी,
जब आधुनिकता के साथ संस्कार भी हमारे जीवन में जीवित रहें।
– कृष्णा गुरुजी
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक, योग एवं समाज जागरण अभियानकर्ता

