मेरे मरने के बाद का सपना: धरती हरी-भरी रहे, इसलिए मेरा अंतिम संस्कार विद्युत दाह गृह में हो

कृष्णा गुरुजी का पर्यावरण संरक्षण संकल्प – धरती हरी-भरी रहे, इसलिए अंतिम संस्कार विद्युत दाह गृह में करने का संदेश।

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मेरे मरने के बाद का सपना: धरती हरी-भरी रहे, इसलिए मेरा अंतिम संस्कार विद्युत दाह गृह में हो

पर्यावरण संरक्षण के लिए समयानुकूल सोच का एक व्यक्तिगत संकल्प

लेखक: कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’

क्या इंसान केवल जीते-जी ही सपने देखता है? क्या मृत्यु के बाद के लिए कोई सपना नहीं हो सकता?

मेरा भी एक सपना है। यह सपना मेरी मृत्यु के बाद का है।

मैं चाहता हूँ कि आने वाली पीढ़ियों को हरी-भरी धरती मिले। मैं चाहता हूँ कि वातावरण स्वच्छ और संतुलित रहे। वृक्ष सुरक्षित रहें। नदियाँ निर्मल बहती रहें। प्रकृति सदैव मुस्कुराती रहे।

इसी सोच के साथ मैंने अपने परिवार को अपनी इच्छा बता दी है। मेरे निधन के बाद मेरा अंतिम संस्कार विद्युत दाह गृह में किया जाए। इसके अलावा, मैं पारंपरिक लकड़ियों का उपयोग नहीं चाहता।

मेरा यह निर्णय किसी परंपरा या आस्था का विरोध नहीं है। बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति मेरी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता का प्रतीक है। मेरा मानना है कि समय के साथ कुछ सामाजिक परंपराओं पर विचार करना भी आवश्यक होता है। साथ ही, उनमें सकारात्मक परिवर्तन लाना समाज के हित में हो सकता है।

सनातन का मूल संदेश: प्रकृति का सम्मान

सनातन धर्म के वेद, विशेषकर ऋग्वेद, प्रकृति को देवतुल्य मानते हैं। इसी कारण नदियों, पर्वतों और वृक्षों को पूजनीय बताया गया है। हमारे ऋषियों ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना। वास्तव में, उन्होंने उसे जीवन का आधार माना है।

प्राचीन काल में जनसंख्या कम थी। उस समय वन-सम्पदा भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी. इसके अलावा, विद्युत दाह गृह जैसी आधुनिक सुविधाएँ नहीं थीं। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के लिए आधुनिक विकल्पों पर विचार करना समय की आवश्यकता लगती है।

कोरोना काल ने हमें क्या सिखाया?

कोरोना महामारी का कठिन दौर आज भी हमारी स्मृतियों में ताज़ा है। उस समय अनेक परिवार अपने प्रियजनों का अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए थे।

इसके अलावा, कई स्थानों पर परिस्थितियों के कारण सामूहिक और त्वरित अंतिम संस्कार हुए।

उस कठिन समय में मानव जीवन और सुरक्षा को सर्वोपरि माना गया। फलस्वरूप, समाज ने अनेक व्यावहारिक बदलाव स्वीकार किए। परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेना उस समय की आवश्यकता थी।

ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। जब विपत्ति के समय हम व्यावहारिक बदलाव अपना सकते हैं,

तो सामान्य समय में पर्यावरण संरक्षण के लिए सकारात्मक विकल्पों पर विचार क्यों नहीं कर सकते?

मृत्यु भोज के स्थान पर सेवा का संकल्प

मैंने अपने परिवार से एक और अनुरोध किया है। मेरी मृत्यु के बाद किसी प्रकार का मृत्यु भोज या ब्राह्मण भोज आयोजित न किया जाए।

इसके स्थान पर उस धन का उपयोग वृक्षारोपण में किया जा सकता है। गौसेवा भी एक अच्छा विकल्प है। शिक्षा और चिकित्सा में सहयोग किया जा सकता है। जरूरतमंद लोगों की सहायता भी की जा सकती है। इससे समाज और प्रकृति दोनों को लाभ मिलेगा।

परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से

समाज में बड़े बदलाव सदैव स्वयं से शुरू होते हैं। इसलिए मैंने यह संकल्प अपने जीवन से ही प्रारंभ करने का प्रयास किया है।

यदि मेरा यह छोटा-सा कदम कुछ लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित कर सके, तो मैं इसे अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि मानूँगा।


🌳 समाज के लिए एक विचार 🌳

यदि हम जीवन में एक पेड़ लगाते हैं, तो मृत्यु के बाद कम से कम एक पेड़ बचाने का संकल्प भी ले सकते हैं।

आज आधुनिक विद्युत दाह गृह जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इसलिए, जो लोग स्वेच्छा से पर्यावरण संरक्षण के लिए इस विकल्प को अपनाना चाहें, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और स्वच्छ पृथ्वी के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

मेरा यह विचार किसी परंपरा या धार्मिक आस्था का विरोध नहीं है। बल्कि यह प्रकृति संरक्षण के प्रति मेरा व्यक्तिगत संकल्प और सामाजिक संवाद का एक प्रयास है। प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को अपनी आस्था एवं परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने का पूरा अधिकार है।

सनातन संस्कृति हमें प्रकृति का सम्मान, संरक्षण और संतुलन का संदेश देती है। इसलिए समय के अनुरूप पर्यावरण हितैषी विकल्पों पर विचार करना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी हो सकती है।

“क्या इंसान केवल जीते-जी ही सपने देखता है? मेरा सपना मेरी मृत्यु के बाद का है। मैं चाहता हूँ कि मेरी धरती हरी-भरी रहे, वृक्ष सुरक्षित रहें और प्रकृति मुस्कुराती रहे।”

जीवन आपका, सुझाव मेरा।

— कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’ 🌿🙏

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