त्योहार आते ही बाजार में इसकी मांग बढ़ने लगती है। कई बार लोग इसके दाम बढ़ने की बात भी कहते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि इस अवसर पर गिलकी ही क्यों चुनी जाती है?
कलियुग पुराण की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी इस लोकपरंपरा को एक आध्यात्मिक संदेश से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, गिलकी के भजिए भीतर के विकारों
और उनकी आसक्ति से सहज मुक्ति का स्मरण करा सकते हैं। आइए, पहले इसका व्यावहारिक पक्ष समझें।
दशहरे पर गिलकी महंगी क्यों हो जाती है?
किसी वस्तु की मांग बढ़ने पर उसकी कीमत बढ़ सकती है। दशहरे पर अनेक परिवार गिलकी खरीदते हैं।
यदि बाजार में इसकी आवक उसी अनुपात में न बढ़े, तो दाम ऊपर जा सकते हैं।
हालांकि हर बाजार में और हर साल ऐसा होना जरूरी नहीं है। कीमत स्थानीय उपलब्धता, मौसम और आवक पर भी निर्भर करती है।
इसलिए बढ़ी मांग एक संभावित कारण है, कोई निश्चित नियम नहीं।
दाम का यह सवाल हमें परंपरा की ओर भी ले जाता है। आखिर रावण दहन के बाद गिलकी के भजिए बनाने का क्या भाव हो सकता है?
गिलकी के भजिए और मालवा की लोकपरंपरा
त्योहारों की पहचान पूजा के साथ स्थानीय भोजन से भी बनती है। मालवा में गिलकी के भजिए ऐसी ही एक परिचित परंपरा हैं।
रावण दहन के बाद परिवार के साथ बैठकर इन्हें खाना उत्सव का आनंद बढ़ाता है।
इसके साथ एक जीवनोपयोगी संदेश भी समझा जा सकता है। यह संदेश परंपरा की प्रमाणित ऐतिहासिक उत्पत्ति का दावा नहीं है।
यह उसके माध्यम से आत्मचिंतन करने की आध्यात्मिक व्याख्या है।
महामृत्युंजय मंत्र में बंधन से मुक्ति का भाव
भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र में कहा गया है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
मंत्र में “उर्वारुकमिव” को पकी ककड़ी के अपने बंधन से मुक्त होने की उपमा से समझाया जाता है। इसमें मृत्यु के बंधन से मुक्ति की प्रार्थना है।
इस उपमा का प्रमुख भाव सहजता से बंधन छूटना है।
मंत्र का पाठ और शब्दार्थ पढ़ने के लिए
महामृत्युंजय मंत्र का संदर्भ और अर्थ
देखें।
ककड़ी, खीरा और गिलकी से क्या संदेश लें?
ककड़ी, खीरा और गिलकी बेल पर लगते हैं। पके फल के बंधन से मुक्त होने की उपमा हमें आसक्ति छोड़ने का भाव समझाती है।
हालांकि इन सभी फलों का पकते ही अपने आप गिरना सार्वभौमिक नियम नहीं है। यहां ध्यान वनस्पति के नियम से अधिक आध्यात्मिक प्रतीक पर है।
इसी आधार पर गिलकी को सहज मुक्ति का स्मरण कराने वाला प्रतीक माना जा सकता है। मंत्र में गिलकी के भजिए खाने का निर्देश नहीं है।
यह संबंध लोकपरंपरा की एक चिंतनपरक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
नवरात्रि की साधना और विकारों से मुक्ति
नवरात्रि के नौ दिन साधना और आत्मसंयम का अवसर देते हैं। इस दौरान हम अपने विचारों और व्यवहार पर ध्यान देते हैं।
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों को पहचानने का प्रयास करते हैं।
लेकिन साधना का उद्देश्य केवल नौ दिनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। जिन विकारों की पकड़ कम हुई, उनकी आसक्ति फिर न लौटे।
इसलिए विजयादशमी पर इस अभ्यास को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया जा सकता है।
“हमारे भीतर के विकारों के बंधन सहजता से छूटें। उनकी आसक्ति फिर न लौटे। जीवन में विवेक, शांति और सद्भाव बढ़े।”
दशहरे पर गिलकी क्यों खाई जाती है: आध्यात्मिक दृष्टि
कृष्णा गुरुजी के अनुसार, कलियुग पुराण में इस प्रश्न को परंपरा के प्रतीकात्मक भाव से समझाया गया है।
रावण दहन के बाद गिलकी के भजिए खाना भीतर के बंधनों से मुक्ति के संकल्प का अवसर बन सकता है।
बाहर रावण का पुतला जलता है। उसी समय हमें भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को भी पहचानना चाहिए।
गिलकी के माध्यम से यह भाव याद रखा जा सकता है कि विकारों की पकड़ छूटे और उनके प्रति आसक्ति समाप्त हो।
केवल भोजन करने से विकार दूर नहीं होते। इसके लिए व्यवहार में बदलाव आवश्यक है।
भोजन की परंपरा उस बदलाव का स्मरण करा सकती है।
इसी विषय को आगे समझने के लिए पढ़ें:
रावण दहन का महत्व और भीतर के दस विकार।
रावण की शिवभक्ति से मिलने वाली सीख
परंपरागत कथाओं में रावण को शिवभक्त और विद्वान माना गया है। फिर भी उसका अहंकार उसके पतन का कारण बना।
इसलिए ज्ञान और भक्ति के साथ विनम्रता भी जरूरी है।
विजयादशमी हमें अपने आचरण पर विचार करने का अवसर देती है। क्या हमारा ज्ञान हमें विनम्र बना रहा है?
क्या हमारी साधना से क्रोध कम हो रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर ही भीतर के परिवर्तन की दिशा बताते हैं।
इस विषय पर
रावण दहन और भीतर के विकारों पर वीडियो संवाद
भी देखें।
सनातन परंपरा के साथ तर्क और जीवन-संदेश
परंपरा का अर्थ पूछना उससे जुड़ने का एक माध्यम है। जब नई पीढ़ी किसी रीति का भाव समझती है,
तो उसका जुड़ाव अधिक सार्थक हो सकता है।
इसलिए लोकपरंपरा, व्यावहारिक कारण और आध्यात्मिक व्याख्या को स्पष्ट रूप से समझना उपयोगी है।
यहां बढ़ी मांग गिलकी के दाम को प्रभावित कर सकती है। भजिए बनाने की परंपरा परिवार को एक साथ लाती है।
वहीं, मुक्ति का प्रतीक हमें अपने भीतर सुधार करने की प्रेरणा देता है।
इस विजयादशमी पर एक छोटा संकल्प लें
परिवार के साथ गिलकी के भजिए खाते समय स्वयं से पूछें: मुझे किस विकार की पकड़ कम करनी है? किसी के लिए वह क्रोध हो सकता है।
किसी के लिए ईर्ष्या, लोभ या अहंकार।
फिर एक छोटा कदम चुनें। क्रोध आए तो उत्तर देने से पहले ठहरें। ईर्ष्या आए तो दूसरे की सफलता स्वीकार करें।
अहंकार आए तो किसी की बात ध्यान से सुनें। ऐसे अभ्यास से त्योहार का संदेश जीवन में उतरता है।
रावण का पुतला जले और भीतर की कटुता भी घटे। विकारों के बंधन छूटें तथा उनकी आसक्ति फिर न लौटे।
यही विजयादशमी का सार्थक संकल्प बने।
सभी पाठकों और दर्शकों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!
कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’
आध्यात्मिक चिंतक एवं कलियुग पुराण के लेखक

