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	<title>KALIYUG PURAN Archives - krishnaguruji</title>
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	<title>KALIYUG PURAN Archives - krishnaguruji</title>
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		<title>दीपावली की सफाई: ग्रह-वास्तु के साथ इन 3 चीजों का रखें ध्यान Krishna Guruji</title>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Oct 2026 16:35:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Diwali]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दीपावली की सफाई की शुरुआत माता-पिता के कमरे से करें। कलियुग पुराण की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी का संदेश—अनुपयोगी सामान छाँटें, जरूरतमंदों को दान दें और घर के साथ मन को भी सँवारें।</p>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/diwali-cleaning-vastu-tips-2026/">दीपावली की सफाई: ग्रह-वास्तु के साथ इन 3 चीजों का रखें ध्यान Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi"><strong>दीपावली की सफाई</strong> केवल दीवारें, खिड़कियाँ और अलमारियाँ चमकाने तक सीमित नहीं है।</p>
<p>यह घर की व्यवस्था सुधारने, उपयोगी वस्तुओं का</p>
<p>सम्मान करने और जरूरतमंदों की सहायता करने का अवसर भी है। इस दीपावली दवाइयों का डब्बा, पुराने जूते-चप्पल और मसालों के डिब्बे जरूर याद रखें।</p>
<p>भारत में हों या विदेश में, त्योहार हमें अपनी संस्कृति और परिवार से जोड़ते हैं। इसी भावना के साथ कृष्णा गुरुजी ने अपने ऑनलाइन सत्संग</p>
<p>में <strong>कलियुग पुराण की दृष्टि से सफाई, ग्रह-वास्तु और सेवा</strong> का संदेश दिया। Divine Vastu Healing और</p>
<p>Divine Astrology के इस संवाद का केंद्र था—घर में वही रखें, जिसका उपयोग, देखभाल और सम्मान कर सकें।</p>
<h2>दीपावली की सफाई कहाँ से शुरू करें?</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी का सुझाव है कि सफाई की शुरुआत माता-पिता के कमरे से करें। उनका बिस्तर, अलमारी और रोजमर्रा की वस्तुएँ व्यवस्थित करें।</p>
<p>साथ ही उनकी सुविधा और इच्छा का ध्यान रखें। यदि माता-पिता की तस्वीरें घर में हैं, तो उन्हें भी आदरपूर्वक साफ करें।</p>
<p>इस शुरुआत का भाव है कि त्योहार की तैयारी में घर के बुजुर्ग पीछे न छूटें। उनके कमरे को सँवारने के साथ कुछ समय उनके पास बैठें।</p>
<p>उनसे पूछें कि उन्हें किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं है।</p>
<h3>ग्रहों और पारिवारिक संबंधों का आध्यात्मिक संकेत</h3>
<p>इस सत्संग में कृष्णा गुरुजी ने सूर्य और चंद्रमा को माता-पिता, मंगल को भाइयों तथा गुरु को बच्चों से जोड़कर सफाई का क्रम समझाया।</p>
<p>इसके अनुसार माता-पिता के स्थान से शुरुआत करके परिवार के अन्य कमरों, बच्चों के कमरे और अपने शयनकक्ष को व्यवस्थित किया जा सकता है।</p>
<p><em>यह वक्ता की आध्यात्मिक व्याख्या है। सफाई से ग्रहों की स्थिति बदलने या निश्चित फल मिलने का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसका व्यावहारिक संदेश परिवार की देखभाल और घर की सुव्यवस्था है।</em></p>
<h2>दीपावली की सफाई में ये 3 चीजें न भूलें</h2>
<h3>1. दवाइयों का डब्बा: एक्सपायरी और व्यवस्था देखें</h3>
<p>घर की अलग-अलग दराजों में रखी दवाइयों की जाँच करें। उनके नाम और एक्सपायरी तारीख देखें।</p>
<p>वर्तमान उपयोग की दवाइयों को पहचान सहित व्यवस्थित रखें।</p>
<p>एक्सपायर दवाइयों को अलग रखें, ताकि वे गलती से इस्तेमाल न हों।</p>
<p>एक्सपायर दवाइयाँ किसी जरूरतमंद को दान न करें। उनके सुरक्षित निपटान के लिए स्थानीय फार्मासिस्ट या अधिकृत संग्रह व्यवस्था से जानकारी लें।</p>
<p>केवल सफाई के कारण डॉक्टर द्वारा बताई गई चालू दवाइयाँ न हटाएँ।</p>
<h3>2. पुराने जूते-चप्पल: उपयोग और दान का निर्णय लें</h3>
<p>जूते-चप्पलों की अलमारी खोलकर देखें कि कौन-सी जोड़ी वास्तव में काम आ रही है। जो उपयोग योग्य है, लेकिन अब आप नहीं पहनते,</p>
<p>उसे साफ करके किसी इच्छुक जरूरतमंद को दे सकते हैं। खराब जोड़ी को दान के नाम पर आगे न बढ़ाएँ।</p>
<p>इसी प्रकार कपड़ों की भी छँटाई करें। हर पुरानी वस्तु बेकार नहीं होती। मौसमी कपड़े, यादों से जुड़ी वस्तुएँ और भविष्य की</p>
<p>वास्तविक जरूरत का सामान सोच-समझकर रखें। उद्देश्य अनावश्यक संग्रह घटाना है।</p>
<h3>3. मसालों के डिब्बे: रसोई की छोटी लेकिन जरूरी सफाई</h3>
<p>रसोई की बड़ी अलमारियों के साथ मसालों के डिब्बों पर भी ध्यान दें। उन्हें खाली करके साफ करें और अच्छी तरह सूखने दें।</p>
<p>इसके बाद उपयोग योग्य मसाले वापस भरें। नमी, फफूँद या कीड़े लगे पदार्थ अलग करें।</p>
<p>सिर्फ पुराना होने के कारण हर डिब्बा बदलना जरूरी नहीं है। यदि वह सुरक्षित और अच्छी स्थिति में है, तो सफाई के बाद उपयोग करें।</p>
<p>टूटा ढक्कन या खराब कंटेनर हो, तो उसे बदलें। अन्न का सम्मान उसकी उचित देखभाल और बर्बादी रोकने में भी है।</p>
<h2>अनुपयोगी सामान हटाएँ, उपयोगी वस्तुएँ सम्मान से दें</h2>
<p>“कभी काम आएगा” सोचकर हम कई चीजें वर्षों तक सँभालते रहते हैं। इसलिए दीपावली की सफाई के समय हर वस्तु पर थोड़ा विचार करें।</p>
<p>परिवार की साझा वस्तुओं को हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति की राय भी लें।</p>
<ul>
<li><strong>रखें:</strong> नियमित उपयोग और वास्तविक जरूरत की वस्तुएँ।</li>
<li><strong>दान दें:</strong> साफ, सुरक्षित और उपयोग योग्य सामान।</li>
<li><strong>मरम्मत कराएँ:</strong> ऐसी चीजें जिन्हें ठीक करके फिर इस्तेमाल कर सकते हैं।</li>
<li><strong>अलग निपटाएँ:</strong> खराब सामान और ऐसा कचरा जिसे विशेष निपटान चाहिए।</li>
</ul>
<p>सत्संग में बच्चों के छोटे हो चुके कपड़ों को लेकर भी प्रश्न आया। कृष्णा गुरुजी ने स्पष्ट किया कि उपयोग योग्य कपड़े जरूरतमंदों को देना सेवा का कार्य है।</p>
<p>इसलिए डर के कारण कपड़े जमा रखने के बजाय उन्हें साफ करके सम्मानपूर्वक दिया जा सकता है।</p>
<h2>मुख्य द्वार और बाथरूम की सफाई पर ध्यान दें</h2>
<p>मुख्य द्वार की चौखट, हैंडल और आसपास का स्थान साफ करें। प्रवेश मार्ग में अनावश्यक सामान न रखें।</p>
<p>इसके बाद अपनी सुविधा के अनुसार तोरण और दीप सजाएँ।</p>
<p>सजावट ऐसी हो कि आने-जाने में बाधा न बने।</p>
<p>बाथरूम में फर्श, नल, बाल्टी और पानी निकासी के स्थान की नियमित सफाई करें।</p>
<p>सत्संग में खड़ा नमक रखने की बात भी आध्यात्मिक मान्यता के रूप में कही गई।</p>
<p>ध्यान रखें कि नमक रखना वास्तविक सफाई या कीटाणुनाशन का विकल्प नहीं है।</p>
<p>व्यावहारिक सफाई के लिए<br />
<a href="https://www.cdc.gov/hygiene/about/when-and-how-to-clean-and-disinfect-your-home.html" target="_blank" rel="noopener noreferrer">CDC का घरेलू सफाई और सुरक्षित कीटाणुनाशन संबंधी मार्गदर्शन</a><br />
पढ़ सकते हैं। सफाई उत्पादों के लेबल का पालन करें, हवा आने-जाने दें और अलग-अलग क्लीनर आपस में न मिलाएँ।</p>
<h2>पूजा-स्थान में स्वच्छता, व्यवस्था और श्रद्धा रखें</h2>
<p>घर के मंदिर की सफाई करते समय चौकी, पूजा के बर्तन, दीपक और तस्वीरों को व्यवस्थित करें।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी के संदेश का भाव है कि पूजा-स्थान में रखी वस्तुओं के प्रति नियमित ध्यान और सम्मान होना चाहिए।</p>
<p>यदि बहुत-सी तस्वीरें या मूर्तियाँ जमा हो गई हैं, तो परिवार की आस्था और परंपरा के अनुसार उन्हें व्यवस्थित करें।</p>
<p>अतिरिक्त धार्मिक सामग्री किसी स्वीकार करने वाले मंदिर या श्रद्धालु को सहमति से दी जा सकती है।</p>
<p>उसे बिना अनुमति मंदिर में छोड़ना या नदी में डालना उचित नहीं है। सम्मानपूर्वक और पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्था अपनाएँ।</p>
<h2>घर के साथ मन की सफाई भी करें</h2>
<p>कलियुग पुराण की दृष्टि से त्योहार आत्मचिंतन का अवसर भी हैं। घर सँवारते समय अपने व्यवहार को देखें।</p>
<p>क्या कोई शिकायत बातचीत से दूर हो सकती है?</p>
<p>क्या किसी संबंध में धन्यवाद या क्षमा के लिए जगह बनाई जा सकती है?</p>
<p>इस विषय को आगे समझने के लिए कृष्णा गुरुजी का पूर्व लेख<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/kaliyug-puran-diwali-cleaning-2025/">दिवाली पर घर और मन की सफाई का संदेश</a><br />
पढ़ें। यह 2025 का संबंधित लेख है, जिसमें भीतर की शुद्धि पर भी विचार किया गया है।</p>
<p>इसी क्रम में<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/ravan-dahan-ka-mahatva-das-vikar/">रावण दहन और भीतर के दस विकारों पर चिंतन</a><br />
त्योहारों को अपने व्यवहार में सकारात्मक बदलाव से जोड़ता है।</p>
<h2>पूरा सत्संग देखें: दीपावली की सफाई और ग्रह-वास्तु</h2>
<p>इस वीडियो में कृष्णा गुरुजी ने सफाई का क्रम, अनुपयोगी सामान की छँटाई, बच्चों के कपड़ों के दान और पूजा-स्थान की व्यवस्था पर चर्चा की है।</p>
<p>अंत में “ॐ नमः शिवाय” के साथ सामूहिक ध्यान और सबके कल्याण की प्रार्थना भी है।</p>
<div style="position: relative; width: 100%; padding-bottom: 56.25%; height: 0; overflow: hidden;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="दीपावली की सफाई: ग्रह-वास्तु और तीन जरूरी चीजें — कृष्णा गुरुजी" src="https://www.youtube.com/embed/I8uF35waRIg" width="560" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><a href="https://youtu.be/I8uF35waRIg?si=WpB2D0naOg_p4H0c" target="_blank" rel="noopener noreferrer">YouTube पर पूरा सत्संग देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।</a></p>
<h2>दीपावली की सफाई की छोटी चेकलिस्ट</h2>
<ul>
<li>माता-पिता का कमरा और तस्वीरें साफ कीं।</li>
<li>दवाइयों का डब्बा और एक्सपायरी तारीख जाँची।</li>
<li>जूते-चप्पल तथा कपड़े छाँटे।</li>
<li>दान योग्य सामान साफ करके अलग रखा।</li>
<li>मसालों के डिब्बे और रसोई व्यवस्थित की।</li>
<li>मुख्य द्वार, बाथरूम और शयनकक्ष साफ किए।</li>
<li>पूजा-स्थान की सामग्री सम्मानपूर्वक सँभाली।</li>
<li>परिवार के साथ बातचीत और प्रसन्नता के लिए समय निकाला।</li>
</ul>
<h2>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न</h2>
<h3>क्या दीपावली की सफाई माता-पिता के कमरे से करनी चाहिए?</h3>
<p>कृष्णा गुरुजी इसे सम्मान और कृतज्ञता की सुंदर शुरुआत मानते हैं। यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है।</p>
<p>परिवार की सुविधा, बुजुर्गों के आराम और उपलब्ध समय के अनुसार क्रम रखें।</p>
<h3>क्या बच्चों के छोटे हो चुके कपड़े दान कर सकते हैं?</h3>
<p>हाँ। कपड़े साफ और पहनने योग्य हों, तो किसी जरूरतमंद परिवार की सहमति से दिए जा सकते हैं।</p>
<p>दान में सामने वाले की जरूरत और गरिमा का ध्यान रखें।</p>
<h3>क्या हर पुरानी वस्तु घर से निकाल देनी चाहिए?</h3>
<p>नहीं। वस्तु की उम्र से अधिक उसकी उपयोगिता, स्थिति और आपके लिए महत्व देखें। सफाई का उद्देश्य व्यवस्था बनाना</p>
<p>और अनावश्यक संग्रह कम करना है।</p>
<h3>क्या वास्तु उपाय और ध्यान बीमारी का उपचार हैं?</h3>
<p>इस लेख में उनका उल्लेख आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में है। वे चिकित्सकीय जाँच, दवा या उपचार का विकल्प नहीं हैं।</p>
<h2>इस दीपावली स्वच्छता के साथ सेवा भी अपनाएँ</h2>
<p><strong>दीपावली की सफाई</strong> को परिवार की साझा जिम्मेदारी बनाएँ। माता-पिता की सुविधा, बच्चों की भागीदारी और जरूरतमंदों की सहायता को इसमें स्थान दें। कलियुग पुराण के संदर्भ में कृष्णा गुरुजी का यह संदेश घर की व्यवस्था से आगे बढ़कर संबंधों और व्यवहार को सँवारने की प्रेरणा देता है।</p>
<blockquote><p>“कलियुग की सबसे बड़ी पूजा—अपने आप को खुश रखना।”</p>
<p><cite>— कृष्णा गुरुजी</cite></p></blockquote>
<p>आप दीपावली की सफाई कहाँ से शुरू करते हैं? अपने अनुभव कमेंट में साझा करें। पूरा सत्संग देखें और उपयोगी लगे तो परिवार तथा मित्रों तक पहुँचाएँ।</p>
</article>
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			</item>
		<item>
		<title>दशहरे पर गिलकी क्यों खाई जाती है? Kaliyug Puran से Krishna Guruji की व्याख्या</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/dussehra-par-gilki-kyon-khai-jati-hai/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2026 13:51:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[FESTIVAL TRANSFORMATION]]></category>
		<category><![CDATA[KALIYUG PURAN]]></category>
		<category><![CDATA[Navratri logic]]></category>
		<category><![CDATA[Kaliyug Puran]]></category>
		<category><![CDATA[Krishna Guruji]]></category>
		<category><![CDATA[आत्मचिंतन]]></category>
		<category><![CDATA[कलियुग पुराण]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्णा गुरुजी]]></category>
		<category><![CDATA[गिलकी के भजिए]]></category>
		<category><![CDATA[महामृत्युंजय मंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[मालवा की परंपरा]]></category>
		<category><![CDATA[रावण दहन]]></category>
		<category><![CDATA[विजयादशमी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दशहरे पर गिलकी के भजिए खाने की मालवा की परंपरा क्या संदेश देती है? कृष्णा गुरुजी कलियुग पुराण की दृष्टि से इसे महामृत्युंजय मंत्र के मुक्ति-भाव और भीतर के विकारों से मुक्त होने के संकल्प से जोड़ते हैं।</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi"><strong>दशहरे पर गिलकी क्यों खाई जाती है?</strong> मालवा और इंदौर के अनेक परिवारों में रावण दहन के बाद गिलकी के भजिए खाने की परंपरा है।</p>
<p>त्योहार आते ही बाजार में इसकी मांग बढ़ने लगती है। कई बार लोग इसके दाम बढ़ने की बात भी कहते हैं।</p>
<p>ऐसे में सवाल उठता है कि इस अवसर पर गिलकी ही क्यों चुनी जाती है?</p>
<p><strong>कलियुग पुराण</strong> की दृष्टि से <strong>कृष्णा गुरुजी</strong> इस लोकपरंपरा को एक आध्यात्मिक संदेश से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, गिलकी के भजिए भीतर के विकारों</p>
<p>और उनकी आसक्ति से सहज मुक्ति का स्मरण करा सकते हैं। आइए, पहले इसका व्यावहारिक पक्ष समझें।</p>
<h2>दशहरे पर गिलकी महंगी क्यों हो जाती है?</h2>
<p>किसी वस्तु की मांग बढ़ने पर उसकी कीमत बढ़ सकती है। दशहरे पर अनेक परिवार गिलकी खरीदते हैं।</p>
<p>यदि बाजार में इसकी आवक उसी अनुपात में न बढ़े, तो दाम ऊपर जा सकते हैं।</p>
<p>हालांकि हर बाजार में और हर साल ऐसा होना जरूरी नहीं है। कीमत स्थानीय उपलब्धता, मौसम और आवक पर भी निर्भर करती है।</p>
<p>इसलिए बढ़ी मांग एक संभावित कारण है, कोई निश्चित नियम नहीं।</p>
<p>दाम का यह सवाल हमें परंपरा की ओर भी ले जाता है। आखिर रावण दहन के बाद गिलकी के भजिए बनाने का क्या भाव हो सकता है?</p>
<h2>गिलकी के भजिए और मालवा की लोकपरंपरा</h2>
<p>त्योहारों की पहचान पूजा के साथ स्थानीय भोजन से भी बनती है। मालवा में गिलकी के भजिए ऐसी ही एक परिचित परंपरा हैं।</p>
<p>रावण दहन के बाद परिवार के साथ बैठकर इन्हें खाना उत्सव का आनंद बढ़ाता है।</p>
<p>इसके साथ एक जीवनोपयोगी संदेश भी समझा जा सकता है। यह संदेश परंपरा की प्रमाणित ऐतिहासिक उत्पत्ति का दावा नहीं है।</p>
<p>यह उसके माध्यम से आत्मचिंतन करने की आध्यात्मिक व्याख्या है।</p>
<h2>महामृत्युंजय मंत्र में बंधन से मुक्ति का भाव</h2>
<p>भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र में कहा गया है:</p>
<blockquote><p><strong>ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।<br />
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥</strong></p></blockquote>
<p>मंत्र में “उर्वारुकमिव” को पकी ककड़ी के अपने बंधन से मुक्त होने की उपमा से समझाया जाता है। इसमें मृत्यु के बंधन से मुक्ति की प्रार्थना है।</p>
<p>इस उपमा का प्रमुख भाव सहजता से बंधन छूटना है।</p>
<p>मंत्र का पाठ और शब्दार्थ पढ़ने के लिए<br />
<a href="https://ottawahindutemple.com/library/mantra/mahamrityunjaya-mantra" target="_blank" rel="noopener noreferrer">महामृत्युंजय मंत्र का संदर्भ और अर्थ</a><br />
देखें।</p>
<h2>ककड़ी, खीरा और गिलकी से क्या संदेश लें?</h2>
<p>ककड़ी, खीरा और गिलकी बेल पर लगते हैं। पके फल के बंधन से मुक्त होने की उपमा हमें आसक्ति छोड़ने का भाव समझाती है।</p>
<p>हालांकि इन सभी फलों का पकते ही अपने आप गिरना सार्वभौमिक नियम नहीं है। यहां ध्यान वनस्पति के नियम से अधिक आध्यात्मिक प्रतीक पर है।</p>
<p>इसी आधार पर गिलकी को सहज मुक्ति का स्मरण कराने वाला प्रतीक माना जा सकता है। मंत्र में गिलकी के भजिए खाने का निर्देश नहीं है।</p>
<p>यह संबंध लोकपरंपरा की एक चिंतनपरक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है।</p>
<h2>नवरात्रि की साधना और विकारों से मुक्ति</h2>
<p>नवरात्रि के नौ दिन साधना और आत्मसंयम का अवसर देते हैं। इस दौरान हम अपने विचारों और व्यवहार पर ध्यान देते हैं।</p>
<p>काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों को पहचानने का प्रयास करते हैं।</p>
<p>लेकिन साधना का उद्देश्य केवल नौ दिनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। जिन विकारों की पकड़ कम हुई, उनकी आसक्ति फिर न लौटे।</p>
<p>इसलिए विजयादशमी पर इस अभ्यास को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया जा सकता है।</p>
<blockquote><p>“हमारे भीतर के विकारों के बंधन सहजता से छूटें। उनकी आसक्ति फिर न लौटे। जीवन में विवेक, शांति और सद्भाव बढ़े।”</p></blockquote>
<h2>दशहरे पर गिलकी क्यों खाई जाती है: आध्यात्मिक दृष्टि</h2>
<p><strong>कृष्णा गुरुजी</strong> के अनुसार, <strong>कलियुग पुराण</strong> में इस प्रश्न को परंपरा के प्रतीकात्मक भाव से समझाया गया है।</p>
<p>रावण दहन के बाद गिलकी के भजिए खाना भीतर के बंधनों से मुक्ति के संकल्प का अवसर बन सकता है।</p>
<p>बाहर रावण का पुतला जलता है। उसी समय हमें भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को भी पहचानना चाहिए।</p>
<p>गिलकी के माध्यम से यह भाव याद रखा जा सकता है कि विकारों की पकड़ छूटे और उनके प्रति आसक्ति समाप्त हो।</p>
<p>केवल भोजन करने से विकार दूर नहीं होते। इसके लिए व्यवहार में बदलाव आवश्यक है।</p>
<p>भोजन की परंपरा उस बदलाव का स्मरण करा सकती है।</p>
<p>इसी विषय को आगे समझने के लिए पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/ravan-dahan-ka-mahatva-das-vikar/">रावण दहन का महत्व और भीतर के दस विकार</a>।</p>
<h2>रावण की शिवभक्ति से मिलने वाली सीख</h2>
<p>परंपरागत कथाओं में रावण को शिवभक्त और विद्वान माना गया है। फिर भी उसका अहंकार उसके पतन का कारण बना।</p>
<p>इसलिए ज्ञान और भक्ति के साथ विनम्रता भी जरूरी है।</p>
<p>विजयादशमी हमें अपने आचरण पर विचार करने का अवसर देती है। क्या हमारा ज्ञान हमें विनम्र बना रहा है?</p>
<p>क्या हमारी साधना से क्रोध कम हो रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर ही भीतर के परिवर्तन की दिशा बताते हैं।</p>
<p>इस विषय पर<br />
<a href="https://youtu.be/HxLaeGhen7Y" target="_blank" rel="noopener noreferrer">रावण दहन और भीतर के विकारों पर वीडियो संवाद</a><br />
भी देखें।</p>
<h2>सनातन परंपरा के साथ तर्क और जीवन-संदेश</h2>
<p>परंपरा का अर्थ पूछना उससे जुड़ने का एक माध्यम है। जब नई पीढ़ी किसी रीति का भाव समझती है,</p>
<p>तो उसका जुड़ाव अधिक सार्थक हो सकता है।</p>
<p>इसलिए लोकपरंपरा, व्यावहारिक कारण और आध्यात्मिक व्याख्या को स्पष्ट रूप से समझना उपयोगी है।</p>
<p>यहां बढ़ी मांग गिलकी के दाम को प्रभावित कर सकती है। भजिए बनाने की परंपरा परिवार को एक साथ लाती है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>वहीं, मुक्ति का प्रतीक हमें अपने भीतर सुधार करने की प्रेरणा देता है।</p>
<h2>इस विजयादशमी पर एक छोटा संकल्प लें</h2>
<p>परिवार के साथ गिलकी के भजिए खाते समय स्वयं से पूछें: मुझे किस विकार की पकड़ कम करनी है? किसी के लिए वह क्रोध हो सकता है।</p>
<p>किसी के लिए ईर्ष्या, लोभ या अहंकार।</p>
<p>फिर एक छोटा कदम चुनें। क्रोध आए तो उत्तर देने से पहले ठहरें। ईर्ष्या आए तो दूसरे की सफलता स्वीकार करें।</p>
<p>अहंकार आए तो किसी की बात ध्यान से सुनें। ऐसे अभ्यास से त्योहार का संदेश जीवन में उतरता है।</p>
<p><strong>रावण का पुतला जले और भीतर की कटुता भी घटे। विकारों के बंधन छूटें तथा उनकी आसक्ति फिर न लौटे।</strong></p>
<p><strong> यही विजयादशमी का सार्थक संकल्प बने।</strong></p>
<p>सभी पाठकों और दर्शकों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!</p>
<p><strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’</strong><br />
आध्यात्मिक चिंतक एवं <strong>कलियुग पुराण</strong> के लेखक</p>
</article>
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		<title>रावण दहन का महत्व: इस विजयादशमी भीतर के दस विकारों का भी दहन करें</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Oct 2026 20:13:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>रावण दहन का महत्व केवल पुतला जलाने तक सीमित नहीं है। यह अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे दस विकारों को पहचानने का अवसर है। कलियुग पुराण की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी समझाते हैं कि ज्ञान का सदुपयोग, आत्मचिंतन और ध्यान कैसे विजयादशमी को सार्थक बना सकते हैं।</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>रावण दहन का महत्व: इस विजयादशमी भीतर के दस विकारों का भी दहन करें</p>
<p><strong>कलियुग पुराण की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी का चिंतन</strong></p>
<p>रावण दहन हो या न हो? इस प्रश्न पर अलग-अलग विचार सामने आते हैं। कुछ लोग इसे परंपरा मानते हैं। वहीं, कुछ लोग रावण की विद्वत्ता और शिवभक्ति का उल्लेख करके इसका विरोध करते हैं।</p>
<p>लेकिन रावण दहन का महत्व समझने के लिए एक और प्रश्न जरूरी है। क्या हम केवल बाहर का पुतला जला रहे हैं? या अपने भीतर के अहंकार को भी पहचान रहे हैं?</p>
<p>मेरे दृष्टिकोण से, रावण दहन का संदेश उसके विकारों से सीख लेना है। इसलिए मैं इस परंपरा के पक्ष में हूँ। साथ ही, मेरा आग्रह है कि उत्सव के साथ आत्मचिंतन भी हो।</p>
<p><strong>रावण दहन कर दशहरा मनाएँ। भीतर के दस विकारों का भी दहन कर विजयादशमी को सार्थक बनाएँ।</strong></p>
<h2>रावण की शिवभक्ति का सम्मान, फिर उसका दहन क्यों?</h2>
<p>हमारी सनातन परंपरा की एक सुंदर विशेषता है। हम गुणों का सम्मान करना जानते हैं। साथ ही, गलत आचरण से सीख लेना भी जानते हैं।</p>
<p>परंपरागत रूप से रावण से संबद्ध शिव तांडव स्तोत्र को हम श्रद्धा से गाते हैं। शिव के सम्मुख बैठकर उसका पाठ करते हैं। दूसरी ओर, दशहरे पर रावण दहन भी करते हैं।</p>
<p>इन दोनों में एक गहरा संदेश दिखाई देता है। किसी के ज्ञान की प्रशंसा करना उसके प्रत्येक कर्म का समर्थन करना नहीं है।</p>
<p>विद्वत्ता सम्मान योग्य हो सकती है। लेकिन अहंकार और अन्याय स्वीकार योग्य नहीं हो जाते। इसीलिए रावण की कथा हमें अपने ज्ञान के साथ अपने आचरण को भी देखने का अवसर देती है।</p>
<h2>रावण दहन का महत्व: ज्ञान से अधिक जरूरी उसका सदुपयोग</h2>
<p>ज्ञान अपने आप में दोष नहीं है। भक्ति भी दोष नहीं है। शक्ति प्राप्त करना भी बुरा नहीं है।</p>
<p>लेकिन जब व्यक्ति सोचने लगे, “मुझसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं,” तब समस्या शुरू होती है। इसी प्रकार, अपनी भक्ति को दूसरों से श्रेष्ठ मानना भी अहंकार को बढ़ा सकता है।</p>
<p>रावण की कथा को मैं इसी चेतावनी के रूप में देखता हूँ। ज्ञान के साथ विनम्रता जरूरी है। शक्ति के साथ जिम्मेदारी जरूरी है। वहीं, भक्ति के साथ मर्यादा जरूरी है।</p>
<p><strong>ज्ञान हमें झुकना सिखाए। यदि वही दूसरों को झुकाने का साधन बन जाए, तो आत्मचिंतन आवश्यक है।</strong></p>
<h2>रावण के दस सिर और हमारे भीतर के दस विकार</h2>
<p>कलियुग पुराण की इस चिंतन-दृष्टि में रावण के दस सिरों को दस विकारों के प्रतीक की तरह समझ सकते हैं। यह आत्मनिरीक्षण के लिए एक सांकेतिक व्याख्या है। इसे शास्त्रों की निश्चित सूची मानना आवश्यक नहीं है।</p>
<h3>1. काम — इच्छाओं का अनियंत्रित होना</h3>
<p>स्वाभाविक इच्छाएँ जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन जब इच्छा विवेक और मर्यादा पर हावी हो जाए, तब वह समस्या बनती है।</p>
<p>इसलिए अपनी इच्छा से पूछें: क्या इसकी पूर्ति में किसी का सम्मान या अधिकार प्रभावित हो रहा है?</p>
<h3>2. क्रोध — प्रतिक्रिया पर नियंत्रण खोना</h3>
<p>असहमति होना स्वाभाविक है। लेकिन क्रोध में अपमान करना संबंधों को चोट पहुँचाता है।</p>
<p>इसलिए प्रतिक्रिया देने से पहले रुकें। थोड़ी देर शांत होकर अपनी बात कहें।</p>
<h3>3. लोभ — पर्याप्त होने पर भी और चाहिए</h3>
<p>जरूरत पूरी हो सकती है। लेकिन लोभ को संतुष्ट करना कठिन होता है।</p>
<p>इस दशहरे पर विचार करें। क्या मैं आवश्यकताओं के लिए जुटा रहा हूँ, या केवल संग्रह बढ़ाने के लिए?</p>
<h3>4. मोह — लगाव में विवेक खो देना</h3>
<p>प्रेम संबंधों को मजबूत करता है। लेकिन अंधा मोह गलत बात का समर्थन भी करवा सकता है।</p>
<p>इसलिए अपनापन बनाए रखें। साथ ही, सही और गलत को पहचानने का साहस भी रखें।</p>
<h3>5. अहंकार — स्वयं को सबसे बड़ा मानना</h3>
<p>ज्ञान, पद, धन और प्रसिद्धि अहंकार का आधार बन सकते हैं। यहाँ तक कि अपनी साधना का गर्व भी व्यक्ति को दूसरों से दूर कर सकता है।</p>
<p>इसलिए उपलब्धियों के साथ विनम्रता का अभ्यास करें।</p>
<h3>6. ईर्ष्या — दूसरे की खुशी से दुखी होना</h3>
<p>किसी की सफलता देखकर प्रेरणा मिल सकती है। लेकिन ईर्ष्या हमें तुलना और अशांति में उलझाती है।</p>
<p>दूसरे की प्रगति को अपनी हार न मानें। अपने प्रयासों की दिशा देखें।</p>
<h3>7. आलस्य — जरूरी कर्म को टालना</h3>
<p>विश्राम जरूरी है। लेकिन बार-बार कर्तव्य टालना आलस्य बन सकता है।</p>
<p>इसलिए छोटे कदम से शुरुआत करें। आज का एक अच्छा कर्म कल के बड़े संकल्प से अधिक उपयोगी हो सकता है।</p>
<h3>8. अनियंत्रित तृष्णा — कभी संतोष न होना</h3>
<p>लोभ संग्रह चाहता है। वहीं, तृष्णा लगातार नया अनुभव, प्रशंसा या सुख चाहती रहती है।</p>
<p>इच्छाएँ रखें। लेकिन उनके कारण वर्तमान जीवन की सुंदरता न खोएँ।</p>
<h3>9. द्वेष — मन में शत्रुता बनाए रखना</h3>
<p>असहमति के बाद भी सम्मान बना रह सकता है। लेकिन द्वेष मन को लगातार कटुता से भरता है।</p>
<p>गलत व्यवहार से उचित दूरी रखें। साथ ही, अपने भीतर बदले की आग को न पालें।</p>
<h3>10. कर्तापन का अभिमान — सब कुछ मैंने ही किया</h3>
<p>प्रयास करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन हर सफलता का पूरा श्रेय स्वयं को देना अहंकार बढ़ाता है।</p>
<p>परिवार, समाज और सहयोगियों के योगदान को याद करें। जिम्मेदारी निभाएँ, लेकिन “सब मेरे कारण हुआ” का अभिमान छोड़ें।</p>
<h2>होलिका दहन और रावण दहन से क्या सीखें?</h2>
<p>इस सत्र में मैंने महाशिवरात्रि, होलिका दहन, नवरात्रि और विजयादशमी को एक चिंतन-सूत्र में देखने का प्रयास किया है।</p>
<p>यह त्योहारों की सांकेतिक आध्यात्मिक व्याख्या है।</p>
<p>होलिका की प्रचलित कथा हमें शक्ति के गलत उपयोग पर विचार करने का अवसर देती है।</p>
<p>वहीं, रावण की कथा ज्ञान और सामर्थ्य के साथ जुड़े अहंकार के परिणाम दिखाती है।</p>
<p>इसलिए संदेश शिव या शक्ति के नाश का नहीं है। संदेश उनके नाम पर होने वाले अहंकार और शक्ति के दुरुपयोग के त्याग का है।</p>
<p><strong>शिव भी हमारे चिंतन में हैं। शक्ति भी हमारे जीवन में है। जरूरी यह है कि हमारी क्षमता का उपयोग कल्याण के लिए हो।</strong></p>
<h2>बच्चों को रावण दहन का महत्व कैसे समझाएँ?</h2>
<p>बच्चे दृश्य और अनुभव से बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए रावण दहन उनके लिए केवल मनोरंजन बनकर न रह जाए।</p>
<p>माता-पिता उनसे सरल प्रश्न पूछ सकते हैं:</p>
<ul>
<li>रावण के पुतले के साथ हम अपनी कौन-सी बुरी आदत छोड़ेंगे?</li>
<li>क्या ज्ञान होने के बाद भी गलती हो सकती है?</li>
<li>क्रोध आने पर हम किसी को चोट पहुँचाए बिना क्या कर सकते हैं?</li>
<li>क्या अपनी गलती स्वीकार करना भी विजय है?</li>
</ul>
<p>इस प्रकार उत्सव एक सीखने का अवसर बन सकता है। बच्चा समझ सकता है कि विजय का अर्थ केवल किसी और को हराना नहीं है। अपनी गलत आदत पर नियंत्रण पाना भी विजय है।</p>
<h2>पर्यावरण का सम्मान भी उत्सव की जिम्मेदारी है</h2>
<p>परंपरा के साथ पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी जरूरी है। उत्सव का आध्यात्मिक संदेश अनावश्यक धुएँ, शोर या अपशिष्ट पर निर्भर नहीं है।</p>
<p>इसलिए सुरक्षित और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार आयोजन को महत्व दें। साथ ही, अपने भीतर परिवर्तन का संकल्प लें।</p>
<p>जो लोग विदेश में हैं या रावण दहन देखने नहीं जा सकते, वे भी इस संदेश से जुड़ सकते हैं। ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से दशहरा मनाया जा सकता है।</p>
<h2>ध्यान रूपी दशहरा: अपने भीतर के राम से संवाद</h2>
<p>इस ध्यान में “भीतर के राम” को अपने विवेक, मर्यादा और करुणा का प्रतीक मानें। वहीं, “भीतर के रावण” को उन प्रवृत्तियों का प्रतीक समझें, जो हमें इन गुणों से दूर ले जाती हैं।</p>
<p>आराम से बैठें। सहज लगे तो आँखें बंद करें। फिर अपनी सामान्य श्वास पर ध्यान दें।</p>
<p>अब स्वयं से पूछें:</p>
<p><strong>मेरे भीतर कौन-सा विकार बार-बार सक्रिय होता है?</strong></p>
<p>क्या क्रोध मेरे शब्दों को कठोर बना देता है?  तुलना मेरी शांति छीन लेती है? क्या मैं अपनी उपलब्धियों का अहंकार करता हूँ?</p>
<p>अपने उत्तर को बिना बहाना बनाए स्वीकार करें। फिर एक छोटा संकल्प चुनें।</p>
<p>“क्रोध आने पर मैं तुरंत उत्तर नहीं दूँगा।”</p>
<p>“मैं दूसरों की सफलता पर शुभकामना दूँगा।”</p>
<p>“मैं अपने सहयोगियों के योगदान को स्वीकार करूँगा।”</p>
<p>इसके बाद अपने चेहरे की कल्पना करें। उस पर एक सहज मुस्कान देखें। जब सहज और तैयार महसूस करें, धीरे-धीरे आँखें खोलें।</p>
<h2>नवरात्रि से विजयादशमी: साधना को व्यवहार में उतारें</h2>
<p>इस नवरात्रि ध्यान-यात्रा में हमने ऊर्जा और चक्रों को आत्मचिंतन के प्रतीकों की तरह समझा। हमने उत्साह, रचनात्मकता, उदारता, प्रेम, कृतज्ञता और विवेक पर ध्यान किया।</p>
<p>लेकिन साधना का प्रभाव हमारे व्यवहार में भी दिखना चाहिए। यदि पूजा के बाद भी वही कटुता और अहंकार बना रहे, तो अभ्यास को आगे बढ़ाने की जरूरत है।</p>
<p>नवमी का हवन और दशमी का रावण दहन हमें इसी संकल्प की याद दिला सकते हैं। अपने भीतर की किसी एक कठिन प्रवृत्ति को पहचानें। फिर रोज उसके स्थान पर एक बेहतर व्यवहार चुनें।</p>
<h2>इस विजयादशमी अपने भीतर भी विजय पाएँ</h2>
<p>रावण दहन का महत्व तभी हमारे जीवन में उतरता है, जब हम स्वयं को देखने के लिए तैयार हों।</p>
<p>बाहर का पुतला एक दिन जलता है। लेकिन भीतर के विकारों पर काम करना निरंतर अभ्यास है।</p>
<p>इसलिए इस विजयादशमी केवल उत्सव देखकर न लौटें। अपने साथ एक संकल्प भी लेकर लौटें।</p>
<p><strong>“आइए, अपने भीतर के राम से अपने भीतर के रावण का दहन करें।”</strong></p>
<p>आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। खुश रहें, सुखी रहें, समृद्ध रहें, आरोग्य रहें।</p>
<p>— <strong>कृष्णा गुरुजी</strong><br />
<em>आध्यात्मिक चिंतक | Kaliyug Puran</em></p>
<h2>पूरा सत्संग और ध्यान देखें</h2>
<p>रावण दहन, ज्ञान के अहंकार और ध्यान रूपी दशहरा पर कृष्णा गुरुजी का पूरा संवाद यहाँ देखें:</p>
<p><a href="https://youtu.be/HxLaeGhen7Y?si=9870zjdGHazGzdQ7">▶ रावण दहन का महत्व — पूरा वीडियो देखें</a></p>
<p><strong>इस विजयादशमी आप किस विकार पर काम करने का संकल्प लेंगे? अपना विचार साझा करें।</strong></p>
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		<item>
		<title>नवरात्रि का विज्ञान से संबंध: महाकाल गुरुकुल में संवाद &#124; Kaliyug Puran &#124; Krishna Guruji</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/navratri-vigyan-sambandh-mahakal-gurukul-ujjain/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2026 12:06:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[KALIYUG PURAN]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नवरात्रि का विज्ञान से संबंध और जीवन में उसकी उपयोगिता समझाने के लिए कृष्णा गुरुजी ने उज्जैन के महाकाल गुरुकुल में सौ से अधिक बटुक ब्राह्मणों से संवाद किया। जानिए कलियुग पुराण की दृष्टि से ऋतु परिवर्तन, अनुशासन और आत्मचिंतन का संदेश।</p>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/navratri-vigyan-sambandh-mahakal-gurukul-ujjain/">नवरात्रि का विज्ञान से संबंध: महाकाल गुरुकुल में संवाद | Kaliyug Puran | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article><strong>नवरात्रि का विज्ञान से संबंध</strong>, नवरात्रि और ऋतु परिवर्तन तथा नवरात्रि का जीवन में महत्व क्या है?Krishna Gurujiइन्हीं विषयों पर <strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’ (Krishna Guruji)</strong> ने उज्जैन के महाकाल गुरुकुल में संवाद किया।</p>
<p>उन्होंने <strong>कलियुग पुराण (Kaliyug Puran)</strong> की दृष्टि से पर्व का संदेश समझाया। साथ ही, सौ से अधिक बटुक ब्राह्मणों को परंपराओं का अर्थ जानने के लिए प्रेरित किया।</p>
<h2>Krishna Guruji का महाकाल गुरुकुल उज्जैन में संवाद</h2>
<p>15 अक्टूबर 2026 को महाकाल गुरुकुल आश्रम में यह कार्यक्रम हुआ। यह आश्रम उज्जैन में चिंतामण गणेश मंदिर के सामने स्थित है।</p>
<p>कार्यक्रम में सौ से अधिक बटुक ब्राह्मणों ने भाग लिया।</p>
<p>सबसे पहले कृष्णा गुरुजी ने नवरात्रि का जीवन से संबंध समझाया। इसके बाद Krishna Guruji बच्चों से प्रश्न पूछे। इस तरह संवाद में सीखने और अपने विचार रखने का अवसर मिला।</p>
<p>उनका संदेश था कि पूजा से मिली सीख हमारे व्यवहार में भी दिखनी चाहिए। उदाहरण के लिए, हम दूसरों के प्रति दया और सम्मान रखें।</p>
<p>साथ ही, अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएँ।</p>
<h2>नवरात्रि का विज्ञान से संबंध कैसे समझें?</h2>
<p>विज्ञान हमें प्रश्न पूछना और प्रमाण खोजना सिखाता है। इसलिए किसी परंपरा का उद्देश्य समझते समय खुले मन से विचार करना जरूरी है।</p>
<p>जहाँ वैज्ञानिक आधार मिले, वहाँ सही तथ्य बताए जाएँ।</p>
<p>हालांकि, आध्यात्मिक प्रतीक और वैज्ञानिक प्रमाण अलग बातें हैं। किसी मान्यता का जीवन में अर्थ हो सकता है।</p>
<p>लेकिन उसे वैज्ञानिक तथ्य कहने के लिए जाँच और प्रमाण चाहिए।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी ने बटुकों को इसी समझ के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया। उनके अनुसार,</p>
<p>आने वाली पीढ़ी विधि के साथ उसका कारण भी पूछेगी।</p>
<p>इसलिए भावी मार्गदर्शकों को स्पष्ट और सही उत्तर देने की तैयारी करनी चाहिए।</p>
<h2>नवरात्रि और ऋतु परिवर्तन का जीवन से संबंध</h2>
<p>चैत्र और शारदीय नवरात्रि पर ऋतु परिवर्तन की चर्चा भी होती है। इस संदर्भ में कृष्णा गुरुजी ने बदलते मौसम के प्रति सजग रहने की बात कही।</p>
<p>साथ ही, उन्होंने संतुलित दिनचर्या, साफ-सफाई और संयमित खानपान का महत्व समझाया।</p>
<p>मौसम बदलने का समय अपनी आदतों पर ध्यान देने का अवसर हो सकता है। उदाहरण के लिए, हम अपने सोने और जागने का समय देखें।</p>
<p>इसके अलावा, भोजन और दैनिक कामों में नियमितता लाने का प्रयास करें।</p>
<p>इस तरह नवरात्रि हमें अपने जीवन पर विचार करने की प्रेरणा देती है। हालांकि, ऋतु परिवर्तन से जुड़ाव</p>
<p>अपने-आप हर धार्मिक अभ्यास के स्वास्थ्य लाभ का प्रमाण नहीं है।</p>
<h2>कलियुग पुराण की दृष्टि से नवरात्रि का जीवन में महत्व</h2>
<p>कलियुग पुराण की दृष्टि से इस संवाद में जीवन सुधारने पर जोर दिया गया। प्रश्न यह था कि पर्व मनाने के बाद हमारे व्यवहार में क्या बदलाव आता है।</p>
<p>क्या हम पहले से अधिक शांत, दयालु और जिम्मेदार बने हैं?</p>
<p>इसी विचार के साथ हम छोटे संकल्प ले सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी की बात ध्यान से सुनें।</p>
<p>इसके अलावा, अपने शब्दों से किसी का मन दुखाने से बचें।</p>
<ul>
<li>प्रतिदिन कुछ समय अपने विचारों को समझने के लिए निकालें।</li>
<li>परिवार और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त करें।</li>
<li>क्रोध आने पर उत्तर देने से पहले थोड़ा रुकें।</li>
<li>अपनी एक खराब आदत सुधारने का प्रयास करें।</li>
<li>जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करें।</li>
</ul>
<p>इस प्रकार पर्व की सीख रोजमर्रा के जीवन में उतर सकती है। साथ ही, हमारे संबंधों में प्रेम और सम्मान बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।</p>
<h2>कृष्णा गुरुजी का संदेश: अर्थ और तर्क भी समझाएँ</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी ने बटुकों को सनातन धर्म के भावी स्तंभ बताया। उन्होंने समझाया कि आगे चलकर यजमान उनसे परंपराओं के बारे में प्रश्न पूछेंगे।</p>
<p>इसलिए केवल पूजा की विधि जानना पर्याप्त नहीं होगा।</p>
<p>इसके साथ उसका उद्देश्य और जीवन में उपयोग भी समझाना होगा। यदि किसी प्रश्न का उत्तर मालूम न हो, तो उसे जानने का प्रयास करें।</p>
<p>इस तरह सीखने और सिखाने का क्रम बना रहेगा।</p>
<p>बच्चों की जिज्ञासा सुनना भी जरूरी है। क्योंकि प्रश्न पूछने से विषय को समझने का अवसर मिलता है। इसलिए संवाद में प्रश्नों के लिए स्थान होना चाहिए।</p>
<h2>नवदुर्गा के नौ नाम और सामूहिक ध्यान</h2>
<p>संवाद के दौरान बच्चों से नवदुर्गा के नौ नाम पूछे गए। बच्चों ने उत्साह से उत्तर दिए। इसके बाद माता के नौ स्वरूपों का स्मरण कराया गया।</p>
<ul>
<li>माँ शैलपुत्री</li>
<li>माँ ब्रह्मचारिणी</li>
<li>माँ चंद्रघंटा</li>
<li>माँ कूष्मांडा</li>
<li>माँ स्कंदमाता</li>
<li>माँ कात्यायनी</li>
<li>माँ कालरात्रि</li>
<li>माँ महागौरी</li>
<li>माँ सिद्धिदात्री</li>
</ul>
<p>इसके बाद कृष्णा गुरुजी ने सामूहिक ध्यान कराया। साथ ही, बच्चों को माता के स्वरूपों से प्रेरणा लेने का संदेश दिया।</p>
<p>अंत में सभी ने अपने विचार साझा किए और मिष्ठान्न वितरण हुआ।</p>
<h2>महाकाल गुरुकुल के आचार्यों का सहयोग</h2>
<p>कार्यक्रम में आचार्य रमेश शुक्ला जी और आचार्य हेमंत शर्मा जी उपस्थित रहे। दोनों ने महाकाल गुरुकुल की ओर से भाग लिया।</p>
<p>इसके अलावा, कृष्णा गुरुजी सोशल वेलफेयर सोसायटी की ओर से भारती मंडल सहित अन्य सहयोगी उपस्थित रहे।</p>
<h2>मीडिया कवरेज: अमर उजाला में प्रकाशित खबर</h2>
<p>अमर उजाला ने 15 अक्टूबर 2026 को इस कार्यक्रम की खबर प्रकाशित की। रिपोर्ट में नवरात्रि, जीवन और ऋतु परिवर्तन पर हुए संवाद का उल्लेख है।</p>
<p>साथ ही, बटुकों के सामूहिक ध्यान की जानकारी भी दी गई है।</p>
<p><a href="https://www.amarujala.com/madhya-pradesh/ujjain-krishna-guruji-explains-navratri-significance-seasonal-change-life-2026-10-15/" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
अमर उजाला में कृष्णा गुरुजी के महाकाल गुरुकुल संवाद की खबर पढ़ें<br />
</a></p>
<h2>Krishna Guruji: नवरात्रि संवाद का वीडियो</h2>
<p>इस विषय से संबंधित वीडियो नीचे देखें। यदि वीडियो यहाँ न चले, तो नीचे दिए YouTube लिंक पर क्लिक करें।</p>
<div style="position: relative; width: 100%; height: 0; padding-bottom: 56.25%; overflow: hidden;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="Krishna Guruji का नवरात्रि संवाद — महाकाल गुरुकुल उज्जैन" src="https://www.youtube.com/embed/BXH0Ho9L3SU" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><a href="https://youtu.be/BXH0Ho9L3SU" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
कृष्णा गुरुजी का वीडियो YouTube पर देखें<br />
</a></p>
<h2>नवरात्रि से जुड़ा यह लेख भी पढ़ें</h2>
<p>इसके अलावा, नवरात्रि के अर्थ और जीवन से उसके संबंध पर यह लेख पढ़ सकते हैं:</p>
<p><a href="https://krishnaguruji.com/navratri-logic-with-krishna-guruji/"><br />
कृष्णा गुरुजी के साथ समझें नवरात्रि का तर्क और संदेश<br />
</a></p>
<h2>नवरात्रि में आप कौन-सा संकल्प लेंगे?</h2>
<p>नवरात्रि का विज्ञान से संबंध समझने के लिए जिज्ञासा और प्रमाण जरूरी हैं। वहीं, इसका जीवन से संबंध अपने व्यवहार में बदलाव लाकर समझा जा सकता है।</p>
<p>इसलिए इस पर्व पर एक छोटा और स्पष्ट संकल्प लें।</p>
<p>आप अपने जीवन में कौन-सी अच्छी आदत अपनाना चाहते हैं? अपने विचार नीचे टिप्पणी में साझा करें।</p>
</article>
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			</item>
		<item>
		<title>नवरात्रि चौथा दिन: माँ कूष्मांडा और हृदय चक्र ध्यान &#124; Kaliyug Puran &#124; Krishna Guruji</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/navratri-day-4-maa-kushmanda-heart-chakra-dhyan/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Oct 2026 18:50:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>नवरात्रि चौथा दिन माँ कूष्मांडा की आराधना का दिन है। कृष्णा गुरुजी कलयुग पुराण की दृष्टि से इसे हृदय चक्र ध्यान से जोड़ते हैं। जानें प्रेम, करुणा और अपनत्व का संदेश। साथ ही, मूलाधार से हृदय चक्र तक निर्देशित ध्यान का अनुभव करें।</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi" style="font-size: 18px; line-height: 1.85; overflow-wrap: break-word;"><strong>नवरात्रि चौथा दिन</strong> माँ कूष्मांडा की आराधना का दिन है। लेकिन इसका हमारे जीवन से क्या संबंध है?</article>
<article lang="hi" style="font-size: 18px; line-height: 1.85; overflow-wrap: break-word;">बच्चे अक्सर यही प्रश्न पूछते हैं। केवल देवी का नाम बताने से उनकी जिज्ञासा पूरी नहीं होती।</article>
<article lang="hi" style="font-size: 18px; line-height: 1.85; overflow-wrap: break-word;">वे इसके पीछे का संदेश भी समझना चाहते हैं।इस सत्र में कृष्णा गुरुजी इसका सरल उत्तर देते हैं। वे <strong>कलयुग पुराण की दृष्टि</strong> से माँ कूष्मांडा को हृदय चक्र ध्यान से जोड़ते हैं।</p>
<p>इस ध्यान का मुख्य भाव प्रेम, करुणा और अपनत्व है। साथ ही, यह अपनी भावनाओं को समझने का अवसर है।</p>
<p><em>यह लेख कृष्णा गुरुजी की आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक व्याख्या प्रस्तुत करता है। </em></p>
<p><em>इसमें दिए देवी-चक्र संबंध इसी ध्यान श्रृंखला के संदर्भ में हैं। इन्हें सभी परंपराओं का एक समान मत न मानें।</em></p>
<h2>नवरात्रि चौथा दिन: माँ कूष्मांडा का जीवनोपयोगी संदेश</h2>
<p>कल्पना करें कि बच्चा आपसे पूछता है। “माँ कूष्मांडा का नाम तो सुन लिया।</p>
<p>लेकिन इससे मुझे क्या सीखना चाहिए?”</p>
<p>कृष्णा गुरुजी इस प्रश्न को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार, पर्व का संदेश व्यवहार में उतरना चाहिए।</p>
<p>पूजा के साथ अपने भीतर भी देखना चाहिए। क्या हमारे व्यवहार में प्रेम बढ़ रहा है?</p>
<p>क्या हम दूसरों की भावनाएँ समझ रहे हैं?</p>
<p>इस दृष्टि से चौथे दिन की साधना एक आमंत्रण है। अपने हृदय में करुणा के लिए स्थान बनाएँ।</p>
<p>परिवार के साथ अपनत्व बढ़ाएँ।</p>
<p>इसके बाद यही सद्भाव दूसरे लोगों तक पहुँचाएँ।</p>
<p>नवरात्रि की इसी जीवनोपयोगी दृष्टि को विस्तार से समझने के लिए पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/navratri-logic-with-krishna-guruji/"><br />
कृष्णा गुरुजी की दृष्टि से नवरात्रि का महत्व<br />
</a>।</p>
<h2>माँ कूष्मांडा और हृदय चक्र ध्यान: कलयुग पुराण की दृष्टि</h2>
<p>इस ध्यान श्रृंखला में हर दिन एक भाव पर चिंतन किया जाता है। पहले दिन उत्साह को याद किया गया।</p>
<p>दूसरे दिन रचनात्मकता पर ध्यान दिया गया। तीसरे दिन अपनत्व और उदारता का अभ्यास हुआ।</p>
<p>अब चौथे दिन प्रेम की भावना पर ध्यान है।</p>
<ul>
<li><strong>मूलाधार:</strong> उत्साह से भरे अनुभवों का स्मरण।</li>
<li><strong>स्वाधिष्ठान:</strong> रचनात्मकता और सृजन का आनंद।</li>
<li><strong>नाभि केंद्र:</strong> अपनत्व और उदारता की भावना।</li>
<li><strong>हृदय चक्र:</strong> प्रेम और करुणा का विस्तार।</li>
</ul>
<p>कृष्णा गुरुजी हृदय को पालन और संवेदना से जोड़ते हैं। अपने प्रवचन में वे इसे विष्णु के पालनहार भाव से समझाते हैं।</p>
<p>यहाँ मुख्य संदेश दूसरों की देखभाल करना है। प्रेम को केवल भावना तक सीमित नहीं रखना है।</p>
<p>उसे अपने आचरण में भी लाना है।</p>
<h2>हृदय चक्र ध्यान और अनाहत चक्र का सरल अर्थ</h2>
<p>हृदय चक्र को अनाहत चक्र भी कहा जाता है। इस अभ्यास में छाती के मध्य क्षेत्र पर सहज ध्यान रखा जाता है।</p>
<p>यह प्रेम और करुणा पर चिंतन का प्रतीकात्मक केंद्र है।</p>
<p>बच्चों को इसका अर्थ सरल शब्दों में बता सकते हैं। “कुछ देर शांत बैठो। किसी प्रिय व्यक्ति को याद करो।</p>
<p>अब देखो कि तुम्हारे भीतर कैसी भावना आती है।”</p>
<p>इस तरह बात केवल एक कठिन शब्द तक सीमित नहीं रहती। बच्चा अपने अनुभव से जुड़ता है।</p>
<p>उसे स्नेह और कृतज्ञता महसूस करने का अवसर मिलता है।</p>
<p>यहाँ चक्र का अर्थ आध्यात्मिक ध्यान केंद्र है। इसे शरीर का कोई प्रमाणित शारीरिक अंग या</p>
<p>भावनाएँ उत्पन्न करने वाला जैविक केंद्र नहीं बताया जा रहा है।</p>
<h2>प्रेम और भय: अपने अनुभवों से समझें</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी सत्र में एक परिचित उदाहरण देते हैं। डर लगने पर कई लोग छाती पर हाथ रख लेते हैं।</p>
<p>वहीं, प्रेम जताते समय भी हाथ हृदय की ओर जाता है। हम कहते हैं, “मैं आपको दिल से चाहता हूँ।”</p>
<p>यह उदाहरण हमारी भावनात्मक भाषा को समझाता है। हम हृदय को प्रेम और संवेदना का प्रतीक मानते हैं।</p>
<p>हालाँकि, हाथ का छाती पर जाना चक्रों का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।</p>
<p>प्रवचन में प्रेम को भय से आगे बढ़ने की प्रेरणा बताया गया है। इसका व्यावहारिक अर्थ साहस और संवेदना विकसित करना है।</p>
<p>प्रेम होने पर भी डर महसूस हो सकता है। इसलिए डर के लिए स्वयं को दोष न दें।</p>
<p>किसी कठिन परिस्थिति में प्रेम के साथ विवेक भी जरूरी है। मदद का अर्थ सुरक्षित और उपयोगी कदम उठाना है।</p>
<p>अपनी तथा दूसरों की सुरक्षा भी करुणा का हिस्सा है।</p>
<h2>पूरा वीडियो देखें: माँ कूष्मांडा और हृदय चक्र ध्यान</h2>
<p>इस वीडियो में कृष्णा गुरुजी का पूरा प्रवचन सुनें। इसके बाद मूलाधार से हृदय चक्र तक निर्देशित ध्यान में सहभागी बनें।</p>
<div style="position: relative; width: 100%; max-width: 960px; margin: 20px auto; aspect-ratio: 16/9; background: #111;"><iframe style="position: absolute; inset: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="नवरात्रि चौथा दिन: माँ कूष्मांडा और हृदय चक्र ध्यान | Kaliyug Puran | Krishna Guruji" src="https://www.youtube.com/embed/vpWvZqY6Mr8" width="560" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><strong>YouTube पर पूरा वीडियो खोलें:</strong><br />
<a href="https://youtu.be/vpWvZqY6Mr8?si=po0gc8g2fLHqWnmY" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
<iframe title="नवरात्रि चौथा दिन: माँ कूष्मांडा और हृदय चक्र ध्यान | प्रेम और भय | Kaliyug Puran" width="800" height="450" src="https://www.youtube.com/embed/vpWvZqY6Mr8?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe><br />
</a></p>
<h2>नवरात्रि चौथा दिन: हृदय चक्र ध्यान की सरल विधि</h2>
<p>सबसे पहले आराम से बैठें। आप कुर्सी पर भी बैठ सकते हैं। शरीर को सहज रखें।</p>
<p>आँखें बंद करें या दृष्टि हल्की झुका लें। श्वास को सामान्य रहने दें।</p>
<h3>पहला चरण: मूलाधार पर उत्साह का स्मरण</h3>
<p>अपना ध्यान मूलाधार क्षेत्र की ओर लाएँ। जीवन का कोई उत्साहपूर्ण पल याद करें। ऐसा समय चुनें,</p>
<p>जब आप किसी अच्छे कार्य के लिए प्रेरित थे। उस अनुभव को सहजता से महसूस करें।</p>
<p>इस श्रृंखला में पहला चरण माँ शैलपुत्री के स्मरण से जुड़ा है। भाव है कि जीवन में आगे बढ़ने का उत्साह बना रहे।</p>
<h3>दूसरा चरण: स्वाधिष्ठान पर रचनात्मकता का स्मरण</h3>
<p>अब ध्यान धीरे-धीरे स्वाधिष्ठान क्षेत्र की ओर लाएँ। किसी रचनात्मक अनुभव को याद करें।</p>
<p>वह लेखन, चित्रकला या संगीत हो सकता है।</p>
<p>कोई उपयोगी वस्तु बनाना भी रचनात्मकता है।</p>
<p>इस चरण में माँ ब्रह्मचारिणी का स्मरण किया जाता है। अपने भीतर सृजन के आनंद को स्थान दें। किसी दूसरे से तुलना न करें।</p>
<h3>तीसरा चरण: नाभि केंद्र पर अपनत्व का भाव</h3>
<p>इसके बाद ध्यान नाभि क्षेत्र में लाएँ। अपने मन की भावनाओं को देखें। तुलना या ईर्ष्या दिखे तो उसे शांत भाव से पहचानें।</p>
<p>फिर अपनत्व और उदारता की ओर ध्यान लौटाएँ।</p>
<p>इस श्रृंखला में यह चरण माँ चंद्रघंटा के स्मरण से जुड़ा है। इसका संदेश दूसरों की खुशी में सहभागी बनना है।</p>
<p>पिछले सत्र का विस्तार यहाँ पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/navratri-day-3-maa-chandraghanta-nabhi-chakra-dhyan/"><br />
नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान<br />
</a>।</p>
<h3>चौथा चरण: हृदय चक्र पर प्रेम का विस्तार</h3>
<p>अब ध्यान छाती के मध्य क्षेत्र में लाएँ। किसी ऐसे व्यक्ति को याद करें, जिससे आपको स्नेह मिलता है।</p>
<p>वह परिवार का सदस्य या प्रिय मित्र हो सकता है।</p>
<p>आप किसी सुखद स्मृति को भी याद कर सकते हैं।</p>
<p>माँ कूष्मांडा का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें। अपने भीतर प्रेम और कृतज्ञता के भाव को स्थान दें।</p>
<p>फिर यह शुभकामना सभी तक पहुँचाएँ।</p>
<blockquote><p>“आप यहाँ प्रेम बाँटने आए हैं। आप भी एक प्रेममयी, आनंदमयी मूर्ति हैं।” — कृष्णा गुरुजी</p></blockquote>
<p>यदि कोई विशेष अनुभव न हो, तो भी ठीक है। भावनाएँ पैदा करने का दबाव न डालें।</p>
<p>सहज श्वास के साथ कुछ देर शांत बैठें।</p>
<h3>ध्यान का समापन: सभी के सुख की कामना</h3>
<p>मन में प्रार्थना करें: <strong>लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु।</strong> अर्थात, सभी सुखी हों। अब आसपास की आवाजों पर ध्यान दें।</p>
<p>शरीर को हल्का हिलाएँ। फिर धीरे-धीरे आँखें खोलें।</p>
<p>चाहें तो सामान्य रूप से पानी पिएँ। अभ्यास का भाव अपने व्यवहार में साथ रखें।</p>
<p>किसी से स्नेहपूर्वक बात करना भी इस साधना का विस्तार है।</p>
<h2>बच्चों को माँ कूष्मांडा का संदेश कैसे समझाएँ?</h2>
<p>बच्चों से बातचीत प्रश्नों के माध्यम से शुरू करें। उन्हें अपना अनुभव बताने दें। उत्तर तुरंत देने के बजाय उनकी बात सुनें।</p>
<ul>
<li>तुम्हें सबसे अधिक स्नेह किससे मिलता है?</li>
<li>किसी उदास मित्र की मदद कैसे करोगे?</li>
<li>डर लगने पर किस भरोसेमंद व्यक्ति से बात करोगे?</li>
<li>आज तुम किसके लिए अच्छा काम कर सकते हो?</li>
</ul>
<p>इसके बाद नवरात्रि का संदेश समझाएँ। प्रेम का अर्थ केवल किसी को पसंद करना नहीं है। दूसरे की बात सुनना भी प्रेम है।</p>
<p>जरूरत पड़ने पर मदद करना भी प्रेम है।</p>
<p>इस तरह पूजा का भाव दैनिक जीवन से जुड़ता है। बच्चे श्रद्धा के साथ संवेदनशील व्यवहार भी सीखते हैं।</p>
<h2>प्रकृति से जुड़ना और करुणा को व्यवहार में लाना</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी इस सत्र में प्रकृति से जुड़ने का संदेश भी देते हैं। उनकी दृष्टि में आध्यात्मिक ज्ञान</p>
<p>हमें अपने भीतर देखने की प्रेरणा देता है।</p>
<p>साथ ही, वह प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी याद दिलाता है।</p>
<p>इस भाव को छोटे कार्यों में अपनाएँ। पौधों की देखभाल करें। पानी व्यर्थ न बहाएँ।</p>
<p>पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील रहें। परिवार में किसी की बात धैर्य से सुनें।</p>
<p>इस प्रकार हृदय चक्र ध्यान का संदेश व्यवहार में उतर सकता है। ध्यान के समय महसूस किया</p>
<p>अपनत्व जीवन का हिस्सा बन सकता है।</p>
<h2>महाकाल गुरुकुल: नई पीढ़ी तक नवरात्रि का संदेश</h2>
<p>सत्र के अंत में कृष्णा गुरुजी एक प्रस्तावित पहल का उल्लेख करते हैं।</p>
<p>इसमें महाकाल गुरुकुल के युवा बटुकों से संवाद की योजना है।</p>
<p>विषय है नवरात्रि का जीवनोपयोगी अर्थ।</p>
<p>उनका उद्देश्य बच्चों की जिज्ञासाओं को स्थान देना है। वे चाहते हैं कि विद्यार्थी परंपरा का भाव भी समझें।</p>
<p>आगे चलकर यही विद्यार्थी ज्ञान को दूसरे लोगों तक पहुँचाएँगे।</p>
<p>इसलिए शिक्षा में प्रश्न और संवाद का महत्व है। श्रद्धा के साथ समझ बढ़े।</p>
<p>साथ ही, समझ के साथ सेवा की भावना विकसित हो।</p>
<h2>हृदय चक्र ध्यान: आध्यात्मिक भाव और अध्ययन</h2>
<p>इस लेख में देवी और चक्रों का संबंध आध्यात्मिक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ध्यान और माइंडफुलनेस पर शोध की जानकारी के लिए<br />
<a href="https://www.nccih.nih.gov/health/meditation-and-mindfulness-effectiveness-and-safety" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
NCCIH का ध्यान संबंधी परिचय और शोध-सार<br />
</a></p>
<p>ध्यान को चिकित्सा का विकल्प न बनाएँ। अभ्यास में असुविधा हो तो रुकें।</p>
<p>अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार ही अभ्यास करें।</p>
<h2>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न</h2>
<h3>नवरात्रि के चौथे दिन किस देवी की आराधना होती है?</h3>
<p>नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इस सत्र में कृष्णा गुरुजी इसे प्रेम और करुणा के चिंतन से जोड़ते हैं।</p>
<h3>इस सत्र में माँ कूष्मांडा को किस चक्र से जोड़ा गया है?</h3>
<p>कृष्णा गुरुजी की इस ध्यान श्रृंखला में माँ कूष्मांडा को हृदय चक्र से जोड़ा गया है।</p>
<p>यह उनकी कलयुग पुराण आधारित प्रतीकात्मक व्याख्या है।</p>
<h3>क्या प्रेम का अर्थ कभी डर नहीं लगना है?</h3>
<p>नहीं। प्रेम और डर एक साथ महसूस हो सकते हैं। इस सत्र का संदेश करुणा और साहस को स्थान देना है।</p>
<p>डर महसूस होने पर स्वयं को दोष देना नहीं है।</p>
<h3>क्या ध्यान के लिए विशेष अनुभव होना जरूरी है?</h3>
<p>नहीं। शांति से बैठना और अपने भावों पर ध्यान देना पर्याप्त है। किसी खास अनुभूति की अपेक्षा या दबाव न रखें।</p>
<h2>नवरात्रि चौथा दिन: प्रेम को अपने आचरण में उतारें</h2>
<p>माँ कूष्मांडा की आराधना के साथ अपने व्यवहार पर भी विचार करें। आज किसी की बात धैर्य से सुनें।</p>
<p>किसी प्रिय व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। जरूरतमंद की अपनी क्षमता के अनुसार सहायता करें।</p>
<p><strong>यही इस सत्र का आमंत्रण है: अपने भीतर प्रेम को पहचानें। फिर उसे अपने परिवार, समाज और प्रकृति तक पहुँचाएँ।</strong></p>
<p>आप प्रेम और करुणा को दैनिक जीवन में कैसे अपनाते हैं? अपना अनुभव टिप्पणी में साझा करें।</p>
<p><strong>जय माता दी!</strong><br />
कृष्णा गुरुजी | Krishna Guruji<br />
कलयुग पुराण | Kaliyug Puran</p>
</article>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/navratri-day-4-maa-kushmanda-heart-chakra-dhyan/">नवरात्रि चौथा दिन: माँ कूष्मांडा और हृदय चक्र ध्यान | Kaliyug Puran | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>नवरात्रि का जीवन से क्या संबंध है? मूलाधार व स्वाधिष्ठान ध्यान &#124; Kaliyug Puran &#124; Krishna Guruji</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/navratri-chakra-dhyan-krishna-guruji-kaliyug-puran/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Oct 2026 17:59:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>Explore the connection between नवरात्रि का जीवन से संबंध and personal transformation through rituals and practices.</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article class="kaliyug-puran-navratri" lang="hi">
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<p><strong>नवरात्रि और चक्र ध्यान</strong><br />
का हमारे जीवन से क्या संबंध है?<br />
क्या नवरात्रि केवल नौ दिनों की पूजा है?<br />
या यह अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने<br />
का अवसर भी है?</p>
<p><strong>कलियुग पुराण (Kaliyug Puran)</strong><br />
की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी इन प्रश्नों<br />
का सरल और तार्किक उत्तर देते हैं।<br />
उनके अनुसार नवरात्रि हमें अपने व्यवहार,<br />
विचार और जीवनशैली का निरीक्षण करने<br />
की प्रेरणा देती है।</p>
<p>विशेष रूप से पहले दो दिनों में<br />
<strong>मूलाधार चक्र (Muladhara Chakra)</strong><br />
और<br />
<strong>स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthana Chakra)</strong><br />
का प्रतीकात्मक महत्व समझना उपयोगी है।<br />
इनका संबंध जीवन में स्थिरता,<br />
आत्मविश्वास, अनुशासन और<br />
रचनात्मकता जैसे गुणों से जोड़ा जाता है।</p>
<h2>नवरात्रि का हमारे जीवन से क्या संबंध है?</h2>
<p>नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है नौ रातें।<br />
सनातन परंपरा में यह पर्व देवी दुर्गा<br />
के नौ स्वरूपों की उपासना से जुड़ा है।</p>
<p>लेकिन आज की युवा पीढ़ी<br />
इसके व्यावहारिक अर्थ को भी<br />
समझना चाहती है।<br />
उपवास क्यों किया जाता है?<br />
ध्यान का क्या महत्व है?<br />
और देवी के विभिन्न स्वरूप<br />
हमें क्या सिखाते हैं?</p>
<p>कृष्णा गुरुजी की व्याख्या में<br />
नवरात्रि आत्मचिंतन का अवसर है।<br />
मनुष्य नौ दिनों में अपनी आदतों,<br />
भावनाओं और व्यवहार पर<br />
विशेष ध्यान दे सकता है।</p>
<p>इस दृष्टि से नवरात्रि का उद्देश्यकेवल बाहरी पूजा नहीं,बल्कि अपने भीतर सकारात्मक गुणों<br />
का विकास करना भी है।</p>
<p>नवरात्रि के विस्तृत आध्यात्मिक<br />
और तार्किक अर्थ को समझने के लिए पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/navratri-logic-with-krishna-guruji/"><br />
Navratri Logic with Krishna Guruji<br />
</a>।</p>
<h2>नवरात्रि और सात चक्रों का संबंध</h2>
<p>योग परंपरा में शरीर के सात प्रमुखचक्रों की अवधारणा मिलती है।<br />
ये चक्र ध्यान और आत्मचिंतनकी प्रतीकात्मक प्रणाली का हिस्सा हैं।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी अपनी कलियुग पुराण दृष्टिमें नवरात्रि के देवी स्वरूपों को<br />
इन चक्रों से जोड़कर समझाते हैं।इससे जटिल आध्यात्मिक विचारों<br />
को दैनिक जीवन से जोड़ना आसान होता है।</p>
<p>यह संबंध आध्यात्मिक व्याख्या है।<br />
चक्रों को आधुनिक शरीर विज्ञान में<br />
प्रमाणित शारीरिक अंग नहीं माना जाता।</p>
<h2>पहला दिन: माँ शैलपुत्री मूलाधार चक्र ध्यान</h2>
<h3>Muladhara Chakra – Stability and Discipline</h3>
<p>नवरात्रि के प्रथम दिनमाँ शैलपुत्री की उपासना होती है।<br />
कृष्णा गुरुजी की व्याख्या मेंयह दिन मूलाधार चक्र और<br />
जीवन की स्थिरता से संबंधित है।</p>
<p>मूलाधार चक्र को योग परंपरा में<br />
रीढ़ के आधार क्षेत्र से जोड़ा जाता है।<br />
इसका प्रतीकात्मक संदेश है<br />
सुरक्षा, स्थिरता और दृढ़ संकल्प।</p>
<p>जिस प्रकार मजबूत नींव के बिना<br />
भवन स्थिर नहीं रह सकता,<br />
उसी प्रकार अनुशासन के बिना<br />
जीवन में स्थायी प्रगति कठिन है।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी के अनुसार<br />
मूलाधार का संदेश है:<br />
<strong><br />
आलस्य से सक्रियता की ओर बढ़ें।<br />
भय के स्थान पर आत्मविश्वास विकसित करें।<br />
</strong></p>
<h3>मूलाधार चक्र ध्यान कैसे करें?</h3>
<div class="meditation-box">
<h3>सरल ध्यान अभ्यास</h3>
<ol>
<li>शांत स्थान पर आराम से बैठें।</li>
<li>अपनी रीढ़ को सहज रूप से सीधा रखें।</li>
<li>आँखें बंद करें और सामान्य श्वास लें।</li>
<li>अपना ध्यान शरीर की स्थिरता<br />
और धरती से जुड़ाव पर रखें।</li>
<li>मन में संकल्प लें:<br />
मैं स्थिर, सजग और अनुशासित हूँ।</li>
<li>कुछ मिनट बाद धीरे-धीरे<br />
आँखें खोलें।</li>
</ol>
</div>
<p>इस अभ्यास का उद्देश्य<br />
मन को वर्तमान क्षण में लाना<br />
और अपने संकल्प को मजबूत करना है।</p>
<h2>दूसरा दिन: माँ ब्रह्मचारिणी और स्वाधिष्ठान चक्र</h2>
<h3>Swadhisthana Chakra – Creativity and Self-Control</h3>
<p>नवरात्रि के दूसरे दिन<br />
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।<br />
उनका स्वरूप तपस्या, संयम<br />
और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है।</p>
<p>कलियुग पुराण की दृष्टि में<br />
यह दिन स्वाधिष्ठान चक्र<br />
के साथ जोड़ा गया है।</p>
<p>योग परंपरा में स्वाधिष्ठान चक्र<br />
निचले उदर क्षेत्र से संबंधित माना जाता है।<br />
यह भावनाओं, इच्छाओं<br />
और रचनात्मकता का प्रतीक है।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी के अनुसार<br />
इसका व्यावहारिक संदेश है:<br />
<strong><br />
अपनी इच्छाओं के दास न बनें।<br />
अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों<br />
में लगाना सीखें।<br />
</strong></p>
<p>मनुष्य के भीतर इच्छाएँ होना<br />
स्वाभाविक है।<br />
लेकिन उन इच्छाओं का उपयोग<br />
किस दिशा में किया जाए,<br />
यही आत्मसंयम की परीक्षा है।</p>
<h3>स्वाधिष्ठान चक्र ध्यान कैसे करें?</h3>
<div class="meditation-box">
<h3>भावनात्मक जागरूकता का अभ्यास</h3>
<ol>
<li>सुविधाजनक मुद्रा में बैठें।</li>
<li>आँखें बंद करें।</li>
<li>श्वास को सहज रहने दें।</li>
<li>निचले पेट के क्षेत्र<br />
में सहज जागरूकता रखें।</li>
<li>अपनी भावनाओं को देखें।<br />
उन्हें दबाने या दोष देने<br />
का प्रयास न करें।</li>
<li>संकल्प लें:<br />
मैं अपनी ऊर्जा का उपयोग<br />
सृजन और अच्छे कार्यों में करूँगा।</li>
</ol>
</div>
<p>इस प्रकार ध्यान के माध्यम से<br />
व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं<br />
को समझने का अभ्यास कर सकता है।</p>
<h2>मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र में क्या अंतर है?</h2>
<p>दोनों चक्रों का संदेश अलग है।<br />
फिर भी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।</p>
<ul>
<li><strong>मूलाधार चक्र:</strong><br />
स्थिरता, सुरक्षा, अनुशासन<br />
और आत्मविश्वास का प्रतीक।</li>
<li><strong>स्वाधिष्ठान चक्र:</strong><br />
भावनात्मक जागरूकता, संयम<br />
और रचनात्मकता का प्रतीक।</li>
</ul>
<p>सरल शब्दों में समझें तो<br />
मूलाधार हमें जीवन की मजबूत नींव<br />
बनाने का संदेश देता है।<br />
वहीं स्वाधिष्ठान उस नींव पर<br />
रचनात्मक जीवन विकसित करने<br />
की प्रेरणा देता है।</p>
<h2>नवरात्रि से आज की युवा पीढ़ी क्या सीखे?</h2>
<p>आज जीवन में सुविधाएँ बढ़ रही हैं।<br />
लेकिन साथ ही तनाव,<br />
तुलना और मानसिक व्यस्तता<br />
भी बढ़ रही है।</p>
<p>ऐसे समय में नवरात्रि<br />
आत्मनिरीक्षण का अवसर बन सकती है।<br />
युवा पीढ़ी इन नौ दिनों में<br />
अपनी जीवनशैली की समीक्षा कर सकती है।</p>
<ul>
<li>आलस्य छोड़कर नियमित दिनचर्या अपनाएँ।</li>
<li>अपनी भावनाओं को समझें।</li>
<li>अनावश्यक तुलना से बचें।</li>
<li>अपनी प्रतिभा का रचनात्मक उपयोग करें।</li>
<li>परिवार और समाज के प्रति<br />
जिम्मेदारी निभाएँ।</li>
<li>प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन करें।</li>
</ul>
<p>यही विचार नवरात्रि को<br />
केवल धार्मिक उत्सव से आगे<br />
जीवन परिवर्तन की प्रेरणा<br />
बना सकते हैं।</p>
<h2>कलियुग पुराण की दृष्टि: पूजा से व्यवहार परिवर्तन तक</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी का संदेश है कि<br />
धार्मिक परंपराओं को केवल<br />
दोहराने के बजाय<br />
उनका जीवनोपयोगी अर्थ भी<br />
समझना चाहिए।</p>
<p>यदि हम देवी की पूजा करें,<br />
लेकिन अपने भीतर भय,<br />
आलस्य और अनियंत्रित इच्छाओं<br />
को न समझें,<br />
तो आत्मचिंतन का अवसर अधूरा रह जाता है।</p>
<p>इसलिए कलियुग पुराण की दृष्टि<br />
में नवरात्रि हमें भीतर के<br />
नकारात्मक व्यवहार को पहचानने<br />
और सकारात्मक गुणों को<br />
विकसित करने की प्रेरणा देती है।</p>
<p>सनातन दर्शन की ऐसी अन्य<br />
तार्किक व्याख्याओं के लिए पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/krishna-guruji-blog/"><br />
Krishna Guruji Spiritual Blog<br />
</a>।</p>
<h2>पूरा वीडियो देखें: नवरात्रि और चक्र ध्यान</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी के साथ<br />
<strong>मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र</strong><br />
पर केंद्रित संयुक्त ध्यान सत्र देखें।<br />
इसमें नवरात्रि, आत्मअनुशासन<br />
और जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन<br />
के संदेश को समझें।</p>
<div class="video-wrapper"><iframe title="नवरात्रि का जीवन से क्या संबंध है? मूलाधार व स्वाधिष्ठान ध्यान | Kaliyug Puran | Krishna Guruji" src="https://www.youtube.com/embed/Dq3s9Y6sxKo" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><strong>YouTube पर पूरा वीडियो देखें:</strong><br />
<iframe title="नवरात्रि साधना: मूलाधार से स्वाधिष्ठान तक की यात्रा | Krishna Guruji" width="800" height="450" src="https://www.youtube.com/embed/Dq3s9Y6sxKo?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<h2>नवरात्रि का तीसरा दिन: नाभि चक्र ध्यान</h2>
<p>पहले दो चक्रों के बाद<br />
नवरात्रि के तीसरे दिन<br />
माँ चंद्रघंटा और मणिपुर<br />
अर्थात नाभि चक्र का<br />
प्रतीकात्मक संबंध समझाया गया है।</p>
<p>यह ध्यान हमें ईर्ष्या<br />
और अनावश्यक तुलना से ऊपर उठकर<br />
दूसरों की सफलता में<br />
प्रसन्न होना सिखाता है।</p>
<p>तीसरे दिन के ध्यान<br />
और विस्तृत संदेश को पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/navratri-day-3-maa-chandraghanta-nabhi-chakra-dhyan/"><br />
नवरात्रि तीसरा दिन:<br />
माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान<br />
</a>।</p>
<h2>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)</h2>
<h3>1. नवरात्रि और चक्र ध्यान का क्या संबंध है?</h3>
<p>कृष्णा गुरुजी की आध्यात्मिक व्याख्या<br />
में नवरात्रि के देवी स्वरूपों<br />
को योग के प्रमुख चक्रों के<br />
प्रतीकात्मक संदेशों से जोड़ा जाता है।<br />
इसका उद्देश्य आत्मचिंतन<br />
और सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन है।</p>
<h3>2. मूलाधार चक्र किस देवी से संबंधित है?</h3>
<p>कृष्णा गुरुजी की इस व्याख्या मेंमूलाधार चक्र को माँ शैलपुत्री<br />
से जोड़ा गया है।इसका संदेश स्थिरता,<br />
अनुशासन और आत्मविश्वास है।</p>
<h3>3. स्वाधिष्ठान चक्र का क्या महत्व है?</h3>
<p>स्वाधिष्ठान चक्र को<br />
भावनाओं, इच्छाओं,<br />
संयम और रचनात्मकता<br />
का प्रतीक माना जाता है।<br />
इसे माँ ब्रह्मचारिणी<br />
के संदेश से जोड़ा गया है।</p>
<h3>4. क्या नए साधक चक्र ध्यान कर सकते हैं?</h3>
<p>सामान्य, सहज ध्यानका अभ्यास नए साधक भी<br />
अपनी सुविधा के अनुसार कर सकते हैं।श्वास को जबरदस्ती रोकने<br />
या कठिन आसन करने की आवश्यकता नहीं है।</p>
<h3>5. क्या चक्र ध्यान वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है?</h3>
<p>चक्र योग की पारंपरिकआध्यात्मिक अवधारणा हैं।</p>
<p>कुछ प्रकार के ध्यान परवैज्ञानिक शोध उपलब्ध हैं।</p>
<p>लेकिन विशिष्ट चक्रों केअस्तित्व या उन्हें सक्रिय करनेके दावों का ठोस वैज्ञानिकप्रमाण स्थापित नहीं है।</p>
<h2>निष्कर्ष: नवरात्रि केवल उत्सव नहीं, आत्मचिंतन का अवसर</h2>
<p>नवरात्रि हमें अपने भीतरझाँकने का अवसर देती है।<br />
पहले दिन का मूलाधारहमें स्थिरता और अनुशासन<br />
का संदेश देता है।</p>
<p>वहीं दूसरे दिन का स्वाधिष्ठानभावनात्मक जागरूकता<br />
और रचनात्मकता की प्रेरणा देता है।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी की कलियुग पुराण दृष्टिमें नवरात्रि का संदेश है:<br />
पूजा के साथअपने व्यवहार को भी बेहतर बनाएँ।</p>
<p><strong><br />
जब जीवन में अनुशासन,<br />
संयम, प्रेम और सेवा बढ़ती है,<br />
तभी उत्सव का संदेश<br />
व्यवहार में दिखाई देता है।<br />
</strong></p>
<p>जय माता दी।</p>
<p><strong><br />
कृष्णकांत मिश्रा &#8216;कृष्णा गुरुजी&#8217;<br />
</strong><br />
International Spiritual Mind Mentor<br />
Author – Kaliyug Puran<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/"><br />
www.krishnaguruji.com<br />
</a></p>
<hr />
<p><small><br class="yoast-text-mark" />&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;<strong>नोट:</strong><br />
यह लेख आध्यात्मिक और योगिक<br />
परंपराओं की व्याख्या प्रस्तुत करता है।<br />
ध्यान किसी चिकित्सा उपचार<br />
का विकल्प नहीं है।<br />
अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार<br />
सहज अभ्यास करें।&lt;br /&gt;</small></p>
</article>
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]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान &#124; Kaliyug Puran</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/navratri-day-3-maa-chandraghanta-nabhi-chakra-dhyan/</link>
					<comments>https://krishnaguruji.com/navratri-day-3-maa-chandraghanta-nabhi-chakra-dhyan/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Oct 2026 18:43:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[KALIYUG PURAN]]></category>
		<category><![CDATA[Navratri logic]]></category>
		<category><![CDATA[Spiritual Wisdom]]></category>
		<category><![CDATA[Kaliyug Puran]]></category>
		<category><![CDATA[Krishna Guruji]]></category>
		<category><![CDATA[Maa Chandraghanta]]></category>
		<category><![CDATA[Navel Chakra Meditation]]></category>
		<category><![CDATA[Navratri Day 3]]></category>
		<category><![CDATA[अपनत्व]]></category>
		<category><![CDATA[आत्मचिंतन]]></category>
		<category><![CDATA[कलियुग पुराण]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्णा गुरुजी]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि तीसरा दिन]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि ध्यान]]></category>
		<category><![CDATA[नाभि चक्र ध्यान]]></category>
		<category><![CDATA[निर्देशित ध्यान]]></category>
		<category><![CDATA[माँ चंद्रघंटा]]></category>
		<category><![CDATA[माँ चंद्रघंटा ध्यान]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://krishnaguruji.com/?p=9659</guid>

					<description><![CDATA[<p>नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा के स्मरण के साथ करें नाभि चक्र ध्यान। कलियुग पुराण की दृष्टि से कृष्णा गुरुजी समझाते हैं ईर्ष्या और तुलना से अपनत्व की ओर बढ़ने का संदेश। वीडियो के साथ जानें ध्यान की सरल विधि और आत्मचिंतन का महत्व।</p>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/navratri-day-3-maa-chandraghanta-nabhi-chakra-dhyan/">नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान | Kaliyug Puran</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi"><strong>नाभि चक्र ध्यान</strong>  Navel Chakra Meditation  इस सत्र का मुख्य विषय है।</p>
<p>कलियुग पुराण se<br />
<strong>नवरात्रि तीसरा दिन</strong> हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है।<br />
<strong>माँ चंद्रघंटा ध्यान</strong> के इस अभ्यास को कृष्णा गुरुजी<br />
<strong>कलियुग पुराण</strong> की दृष्टि से समझाते हैं।<br />
यह <strong>नवरात्रि ध्यान</strong> आत्मचिंतन और अपनत्व का निमंत्रण है।<br />
अंग्रेज़ी में इसे <strong>Navel Chakra Meditation</strong> कहा जाता है।</p>
<p>क्या किसी की सफलता देखकर आपका मन बेचैन होता है?<br />
क्या दूसरों की प्रशंसा सुनना कभी कठिन लगता है?<br />
ऐसे भाव आएँ, तो उन्हें पहचानना पहला कदम है।<br />
इसके बाद हम अपने व्यवहार पर विचार कर सकते हैं।</p>
<p>इस सत्र में कृष्णा गुरुजी एक प्रश्न उठाते हैं।<br />
क्या हम दूसरों की खुशी में खुश हो पाते हैं?<br />
इसी प्रश्न के साथ ध्यान की यात्रा आगे बढ़ती है।</p>
<h2>नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा का आंतरिक संदेश</h2>
<h2>कलियुग पुराण se</h2>
<p>माँ चंद्रघंटा के स्मरण के साथ यह सत्र भीतर की शक्ति पर ध्यान देता है।</p>
<p><br class="yoast-text-mark" />&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;कृष्णा गुरुजी देवी के स्वरूप को हमारे भावों से जोड़ते हैं।<br />
उनके अनुसार, साधना में अपने स्वभाव को देखना भी आवश्यक है।</p>
<p>हम उत्साह, रचनात्मकता और अपनत्व को कैसे स्थान देते हैं?<br />
साथ ही, ईर्ष्या या तुलना आने पर क्या करते हैं?<br />
ये प्रश्न ध्यान को दैनिक जीवन से जोड़ते हैं।</p>
<p><em>यहाँ देवी स्वरूपों और चक्रों का संबंध कृष्णा गुरुजी की<br />
आध्यात्मिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत है।<br />
इसे सभी परंपराओं की एक समान मान्यता न सम</em>झें।</p>
<h2>नाभि चक्र ध्यान  Navel Chakra Meditation में</h2>
<h2>अपने भावों को देखें&lt;/h2&gt;</h2>
<p>इस अभ्यास में ध्यान नाभि के क्षेत्र पर लाया जाता है।<br />
फिर मन में उठते भावों को देखा जाता है।<br />
उद्देश्य किसी भावना को जबरन दबाना नहीं है।<br />
पहले उसे बिना निर्णय किए पहचानना</p>
<h2>है।&lt;/p&gt;</h2>
<p>उदाहरण के लिए, किसी की उपलब्धि सुनकर तुलना उठ सकती है।<br />
ऐसे में कुछ पल रुकें।<br />
स्वयं से पूछें कि यह बेचैनी किस बात की है।<br />
क्या मुझे पीछे छूटने का डर</p>
<h2>है?<br />
या मैं भी सराहना चाहता हूँ?&lt;/p&gt;</h2>
<p>इस तरह आत्मचिंतन के लिए जगह बनती है।<br />
धीरे-धीरे दूसरों को समझने का अवसर भी मिलता है।<br />
यही इस सत्र में अपनत्व की ओर बढ़ने का संदेश</p>
<h2>है।</h2>
<h2>उत्साह से अपनत्व तक: सत्र के तीन चरण कलियुग पुराण se&lt;/h2&gt;</h2>
<p>मुख्य अभ्यास नाभि चक्र पर केंद्रित है।<br />
हालांकि, इसकी शुरुआत मूलाधार से होती है।<br />
इसके बाद ध्यान स्वाधिष्ठान और फिर नाभि पर आता</p>
<h2>है।</h2>
<h3>1. मूलाधार: उत्साह के पलों का स्मरण&lt;/h3&gt;</h3>
<p>पहले शरीर और आसन के स्पर्श को महसूस करें।<br />
फिर मूलाधार पर सहज ध्यान लाएँ।<br />
इस सत्र में इसे माँ शैलपुत्री के स्मरण से जोड़ा गया</p>
<h3>है।&lt;/p&gt;</h3>
<p>अब जीवन का कोई उत्साह भरा पल याद करें।<br />
वह छोटी उपलब्धि भी हो सकती है।<br />
उस समय की खुशी को सहजता से महसूस क</p>
<h3>रें।</h3>
<h3>2. स्वाधिष्ठान: अपनी रचनात्मकता को याद करें&lt;/h3&gt;</h3>
<p>इसके बाद ध्यान स्वाधिष्ठान की ओर ले जाएँ।<br />
सत्र में यह चरण माँ ब्रह्मचारिणी के स्मरण से जुड़ा है।<br />
यहाँ अपने रचनात्मक पलों को याद करने का सुझाव दिया गया</p>
<h3>है।&lt;/p&gt;</h3>
<p>शायद आपने कोई गीत लिखा हो।<br />
किसी समस्या का नया समाधान खोजा हो।<br />
या अपने हाथों से कुछ सुंदर बनाया हो।<br />
इन अनुभवों को याद क</p>
<h3>रें।</h3>
<h3>3. नाभि चक्र: अपनत्व की ओर बढ़ें&lt;/h3&gt;</h3>
<p>अब अपना ध्यान धीरे से नाभि पर लाएँ।<br />
माँ चंद्रघंटा का स्मरण करें।<br />
साथ ही, अपने भीतर उठते विचारों को दे</p>
<h3>खें।</h3>
<p>क्या किसी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या है?<br />
क्या उसकी सफलता स्वीकार करना कठिन लगता है?<br />
इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से खोजें।<br />
फिर उसके कल्याण की भावना का अभ्यास करें।</p>
<h2>नाभि चक्र ध्यान कैसे करें?</h2>
<p>इस सत्र के आधार पर अभ्यास का सरल क्रम नीचे दिया है।<br />
इसे अपनी सहजता के अनुसार करें।</p>
<ol>
<li style="list-style-type: none;">
<ol>
<li>कुर्सी या सुविधाजनक आसन पर बैठें।</li>
<li>आरामदायक लगे, तो आँखें बंद करें।</li>
<li>शरीर और आसन के स्पर्श को महसूस करें।</li>
<li>साँस को सहज रहने दें।</li>
<li>उत्साह और रचनात्मकता से जुड़े पलों को याद करें।</li>
<li>अब धीरे से ध्यान नाभि के क्षेत्र पर लाएँ।</li>
<li>माँ चंद्रघंटा का स्मरण करें।</li>
<li>विचारों और भावों को साक्षी भाव से देखें।</li>
<li>अपने और दूसरों के कल्याण की भावना रखें।</li>
<li>पूर्णता महसूस होने पर धीरे से आँखें खोलें।</li>
<p>&lt;/ol</ol>
</li>
</ol>
<p>&gt;मन भटके, तो स्वयं से नाराज़ न हों।<br />
बस ध्यान वापस ले आएँ।<br />
किसी खास अनुभव की अपेक्षा रखना आवश्यक नहीं है।<br />
असहजता हो, तो अभ्यास रोककर सहज बै</p>
<ol>
<li style="list-style-type: none;">
<ol>ठें।</ol>
</li>
</ol>
<h2>“पूजन अर्चन मैं ना जानूँ, जानूँ तेरा ध्यान”</h2>
<blockquote><p>“पूजन अर्चन मैं ना जानूँ, जानूँ तेरा ध्यान।”</p>
<p>&lt;/blockquote&gt;सत्र में यह भावपूर्ण पंक्ति भी साझा की गई है।<br />
कृष्णा गुरुजी ने गीत के रचनाकार अपने बड़े भाई<br />
श्री चंद्रकांत मिश्रा को बताया</p>
<p>है।&lt;/p&gt;इसका भाव सरल है।<br />
साधक माँ को ध्यान में याद करता है।<br />
साथ ही, सबके कल्याण की कामना करता है।<br />
इस तरह साधना में करुणा को भी स्थान मिलता</p>
<p>है।</p>
<h2>ध्यान का संदेश व्यवहार में कैसे लाएँ?</h2>
<p>ध्यान के बाद अपने व्यवहार पर भी गौर करें।किसी की उपलब्धि पर उसे बधाई दें।</p>
<p>प्रशंसा करते समय तुलना से बचने का प्रयास करें।<br />
दूसरों की बात धैर्य से सुनें।</p>
<p>रात को कुछ पल आत्मचिंतन करें।<br />
आज कब मन में ईर्ष्या आई?<br />
कब आपने किसी की खुशी में भाग लिया?<br />
अगली बार आप क्या बेहतर कर सकते हैं?&lt;/p&gt;</p>
<p>इस अभ्यास का उद्देश्य स्वयं को दोष देना नहीं है।<br />
उद्देश्य अपने भावों को समझना है।<br />
फिर छोटे कदमों से अपनत्व को व्यवहार में लाना</p>
<p>है।</p>
<h2>पूरा वीडियो देखें: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान</h2>
<h2>Navel Chakra Meditation</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी के मार्गदर्शन में पूरा ध्यान सत्र देखें।कलियुग पुराण se<br />
वीडियो में चर्चा और निर्देशित अभ्यास दोनों शामिल हैं।</p>
<div style="position: relative; width: 100%; height: 0; padding-bottom: 56.25%; overflow: hidden;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="नवरात्रि तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा और नाभि चक्र ध्यान | Krishna Guruji" src="https://www.youtube.com/embed/MKCHvwHK424" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><a href="https://youtu.be/MKCHvwHK424?si=VbptWolwk8Iu3hqH" target="_blank" rel="noopener"><br />
YouTube पर पूरा नाभि चक्र ध्यान सत्र देखें<br />
</a></p>
<h2>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न</h2>
<h3>क्या इस वीडियो में केवल नाभि चक्र का ध्यान है?</h3>
<p>इसका मुख्य विषय नाभि चक्र ध्यान है।</p>
<p>शुरुआत में मूलाधार और स्वाधिष्ठान पर भी ध्यान कराया गया है।<br />
इसके बाद अभ्यास नाभि पर केंद्रित होता है।</p>
<h3>क्या ध्यान में कोई विशेष अनुभूति होना जरूरी है?</h3>
<p>नहीं। हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है।</p>
<p>सहज बैठना और विचारों को देखना भी अभ्यास का हिस्सा है।<br />
किसी विशेष अनुभूति के लिए दबाव न बनाएँ।</p>
<h3>क्या यह अभ्यास पूजा के साथ किया जा सकता है?&lt;/h3&gt;</h3>
<p>हाँ। अपनी आस्था के अनुसार ध्यान को स्थान दे सकते हैं।<br />
इस सत्र में आत्मचिंतन और कल्याण की भावना पर जोर</p>
<h3>है।</h3>
<h3>अगले सत्र का विषय क्या है?&lt;/h3&gt;</h3>
<p>वीडियो के अंत में अगले सत्र का विषय हृदय चक्र बताया गया है।<br />
उसमें प्रेम की भावना पर चर्चा का संकेत दिया गया</p>
<h3>है।</h3>
<p><strong>आपका अनुभव:</strong><br />
क्या दूसरों की खुशी में खुश होना आपको सहज लगता है?<br />
अपना विचार नीचे कमेंट में साझा करें।</p>
<p><strong>जय माता दी। Be happy, keep happy.</strong></p></blockquote>
</article>
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			</item>
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		<title>सर्वपितृ अमावस्या पर अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन तर्पण: इंदौर से विश्व तक &#124; Krishna Guruji</title>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2026 17:27:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सर्वपितृ अमावस्या पर कृष्णा गुरुजी के अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सामूहिक तर्पण का केंद्र बना इंदौर। भागीरथपुरा के दिवंगतों, पुणे के केतन अग्रवाल और अज्ञात आत्माओं की शांति के लिए देश-विदेश से प्रार्थना हुई। उज्जैन सिद्धवट, हरिद्वार, ऋषिकेश और पुष्कर की सहभागिता के साथ ब्राह्मण भोजन एवं जरूरतमंदों की सेवा की गई।</p>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/sarva-pitru-amavasya-online-tarpan/">सर्वपितृ अमावस्या पर अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन तर्पण: इंदौर से विश्व तक | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi">
<h2>सर्वपितृ अमावस्या तर्पण: ऑनलाइन जुड़ा विश्व परिवार</h2>
<p><strong>सर्वपितृ अमावस्या तर्पण</strong> के इस आयोजन में <strong>ऑनलाइन पितृ तर्पण</strong> और <strong>अंतरराष्ट्रीय सामूहिक तर्पण</strong> के माध्यम से देश-विदेश के परिवार जुड़े।</p>
<p><strong>Sarva Pitru Amavasya</strong> पर कृष्णा गुरुजी ने पूर्वजों के स्मरण, कृतज्ञता और सेवा का संदेश दिया।</p>
<p>10 अक्टूबर 2026 को आध्यात्मिक चिंतक <strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’</strong> के सान्निध्य में यह निःशुल्क कार्यक्रम आयोजित हुआ।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी सोशल वेलफेयर सोसाइटी की इस पहल का केंद्र इंदौर बना। वहीं उज्जैन के सिद्धवट, हरिद्वार, ऋषिकेश और पुष्कर से पंडितों ने सहभागिता की।</p>
<p>आयोजन का विशेष भाव था—<strong>अपने पितरों के साथ उन्हें भी याद करें, जिनका तर्पण करने वाला कोई नहीं है।</strong></p>
<p>इसलिए अपने पूर्वजों के साथ अज्ञात और असमय दिवंगत लोगों की आत्मशांति के लिए भी प्रार्थना की गई।</p>
<h2>इंदौर से देश-विदेश तक पहुँची सामूहिक प्रार्थना</h2>
<p>ऑनलाइन सत्र में अमेरिका, कनाडा, दुबई, सिंगापुर और यूरोप के विभिन्न स्थानों से लोग जुड़े।</p>
<p>इस माध्यम से दूर रहने वाले परिवारों को भी एक साथ पूर्वजों का स्मरण करने का अवसर मिला।</p>
<p>सहभागियों ने अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और दिवंगत प्रियजनों को नमन किया। साथ ही उन परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की,</p>
<p>जिन्होंने असमय किसी अपने को खो दिया। इस तरह आयोजन ने इंदौर, उज्जैन और पुणे को श्रद्धा के एक सूत्र में जोड़ा।</p>
<h2>भागीरथपुरा के दिवंगतों को श्रद्धांजलि</h2>
<p>सर्वपितृ अमावस्या पर इंदौर के <strong>भागीरथपुरा की दूषित पेयजल त्रासदी में दिवंगत हुए लोगों</strong> का विशेष स्मरण किया गया।</p>
<p>उनकी आत्मशांति और शोकाकुल परिवारों को संबल मिलने की प्रार्थना हुई।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी ने कहा कि किसी परिवार का दुःख केवल उसी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समाज को संवेदना के साथ उसके साथ खड़ा होना चाहिए।</p>
<p>इसी भावना से कार्यक्रम में अपने परिवार के पूर्वजों के अतिरिक्त अन्य दिवंगतों को भी श्रद्धांजलि दी गई।</p>
<h2>पुणे के केतन अग्रवाल की स्मृति में तर्पण</h2>
<p>पुणे के युवा <strong>केतन अग्रवाल</strong> की स्मृति में भी सामूहिक तर्पण और प्रार्थना की गई। कृष्णा गुरुजी ने उनके पिताजी <strong>श्री विशाल अग्रवाल</strong> को कार्यक्रम में आमंत्रित किया था।</p>
<p>उनसे टेलीफोन पर चर्चा कर केतन की स्मृति में किए गए तर्पण की जानकारी भी दी गई।</p>
<p>किसी युवा का असमय चले जाना परिवार के लिए गहरा आघात होता है। इसलिए सहभागियों ने केतन को श्रद्धांजलि देने के साथ उनके परिजनों के लिए धैर्य और संबल की कामना की।</p>
<h2>उज्जैन सिद्धवट से ऑनलाइन पितृ तर्पण</h2>
<p>उज्जैन का पावन <strong>सिद्धवट तीर्थ</strong> भी इस आयोजन में शामिल हुआ। सिद्धवट से लालू गुरु ने कृष्णा गुरुजी के सान्निध्य में ऑनलाइन जुड़कर तर्पण संपन्न कराया।<br />
उन्होंने देश-विदेश के श्रद्धालुओं को सिद्धवट मंदिर और पावन शिप्रा के दर्शन कराए।</p>
<p>इसके साथ अन्य तीर्थस्थलों से जुड़े पंडितों ने भी प्रार्थना में सहभागिता की। ऋषिकेश से माँ गंगा के दर्शन कराए गए।</p>
<p>इस प्रकार ऑनलाइन माध्यम ने दूर बैठे लोगों को तीर्थ दर्शन और सामूहिक स्मरण से जोड़ा।</p>
<ul>
<li><strong>उज्जैन, सिद्धवट:</strong> लालू गुरु</li>
<li><strong>हरिद्वार:</strong> पंडित राजीव शर्मा</li>
<li><strong>ऋषिकेश:</strong> पंडित दिनेश जी</li>
<li><strong>पुष्कर:</strong> योगेश पराशर जी</li>
</ul>
<h2>सर्वपितृ अमावस्या पर ब्राह्मण भोजन और सेवा</h2>
<p><strong>कृष्णा गुरुजी सोशल वेलफेयर सोसाइटी</strong> की ओर से आयोजन से जुड़े इन सभी तीर्थस्थलों पर ब्राह्मणों को भोजन कराया गया।</p>
<p>उज्जैन के सिद्धवट पर लालू गुरु ने तर्पण के साथ ब्राह्मण भोजन की स्थानीय व्यवस्था संपन्न कराई।</p>
<p>इसके अतिरिक्त अलग-अलग स्थानों पर जरूरतमंदों के लिए भोजन सेवा की गई।</p>
<p>मुंबई के हाजी अली क्षेत्र स्थित दिव्यांगजनों की संस्था में भी भोजन की व्यवस्था की गई।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी ने सेवा में भोजन पाने वालों की पसंद और सम्मान का ध्यान रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा भोजन दिया जाए,</p>
<p>जिसे लोग प्रसन्नता से ग्रहण करें। इस प्रकार श्रद्धा के साथ अपनापन भी व्यक्त हो सकता है।</p>
<h2>जिनका कोई नहीं, उनके लिए भी प्रार्थना</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी ने बताया कि वे लगभग बारह वर्षों से इस भावना के साथ आयोजन करते आ रहे हैं। ऑनलाइन कार्यक्रमों से पहले वे स्वयं उज्जैन जाकर सिद्धवट पर तर्पण करते थे</p>
<p>। उन्होंने लगभग 150 लोगों की लावारिस अस्थियों के विसर्जन में सेवा का अवसर मिलने का भी स्मरण किया।</p>
<p>इस वर्ष भी अज्ञात दिवंगतों और आपदाओं में जीवन खोने वाले लोगों को सामूहिक प्रार्थना में स्थान दिया गया।</p>
<p>धार्मिक आस्था के अनुरूप अतृप्त आत्माओं की शांति और सद्गति की कामना की गई।</p>
<blockquote><p>“हम हमारे लिए तो बहुत कुछ कर रहे हैं, क्यों न हम किसी और के लिए?”</p>
<footer>— कृष्णा गुरुजी, ऑनलाइन सत्र के दौरान</footer>
</blockquote>
<h2>कलयुग पुराण की दृष्टि: कृतज्ञता और करुणा</h2>
<p>कलयुग पुराण की अपनी व्याख्या में कृष्णा गुरुजी ने परंपराओं का भाव सरल भाषा में समझाने पर जोर दिया।</p>
<p>उनके अनुसार, अगली पीढ़ी को विधि के साथ उसका उद्देश्य भी समझाना आवश्यक है।</p>
<p>इससे युवा श्रद्धा, कृतज्ञता और सामाजिक जिम्मेदारी को अपने जीवन से जोड़ सकते हैं।</p>
<p>सत्र में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण को धन्यवाद के भाव से समझाया गया:</p>
<ul>
<li><strong>देव ऋण:</strong> प्रकृति और जीवन को सहारा देने वाली शक्तियों के प्रति कृतज्ञता।</li>
<li><strong>ऋषि ऋण:</strong> ऋषियों, गुरुओं और ज्ञान देने वालों के प्रति सम्मान।</li>
<li><strong>पितृ ऋण:</strong> माता-पिता और पूर्वजों के प्रति धन्यवाद, जिनसे जीवन और संस्कार मिले।</li>
</ul>
<p>ध्यान के दौरान सहभागियों से अपने पूर्वजों का स्मरण करने का आग्रह किया गया।</p>
<p>साथ ही जिनके माता-पिता जीवित हैं, उन्हें उनके प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करने की प्रेरणा दी गई।</p>
<h2>अगली पीढ़ी को सेवा का संस्कार दें</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी ने अपना व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया। इस वर्ष उन्होंने अपनी माता की स्मृति में वृद्धाश्रम जाकर वृद्धजनों को भोजन परोसा।</p>
<p>उन्होंने परिवारों से आग्रह किया कि बच्चों को भी दिवंगत प्रियजनों की स्मृति में सेवा करना सिखाएँ।</p>
<p>इसके लिए वृद्धाश्रम, कुष्ठ सेवा आश्रम या जरूरतमंद परिवारों तक अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग पहुँचाया जा सकता है।</p>
<p>उन्होंने सुझाव दिया कि पारंपरिक तिथि याद न होने पर परिवार परिचित कैलेंडर की तारीख पर भी स्मरण</p>
<p>और भोजन सेवा कर सकता है। यह व्यस्त जीवन में सेवा की निरंतरता बनाए रखने का उनका प्रस्ताव था।</p>
<p><strong>Remember with gratitude. Serve with compassion.</strong><br />
अपने पूर्वजों को प्रेम से याद करें। उनकी स्मृति में किसी जरूरतमंद के जीवन में सहारा बनें।</p>
<h2>सर्वपितृ अमावस्या आयोजन की मीडिया कवरेज</h2>
<p>इस आयोजन की समाचार कवरेज के लिए साझा किए गए अमर उजाला और दैनिक भास्कर के लिंक नीचे उपलब्ध हैं।</p>
<p>संबंधित प्रकाशन की वेबसाइट पर मूल समाचार पढ़ें।</p>
<ul>
<li><a href="https://www.amarujala.com/madhya-pradesh/indore-international-collective-ritual-offering-of-water-for-the-victims-of-the-bhagirathpura-water-tragedy-2026-10-10/" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
अमर उजाला: भागीरथपुरा के दिवंगतों के लिए अंतरराष्ट्रीय सामूहिक तर्पण का समाचार<br />
</a></li>
<li><a href="https://dainik.bhaskar.com/cYLNB20p76b?ref=MjA4OTI0MDg4NTgyMTkxMTA0MA%3D%3D" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
दैनिक भास्कर: समाचार कवरेज पढ़ें<br />
</a></li>
</ul>
<h2>सर्वपितृ अमावस्या ऑनलाइन तर्पण: वीडियो देखें</h2>
<p>दोनों वीडियो नीचे उपलब्ध हैं। इन्हें यहाँ या सीधे YouTube पर देखा जा सकता है।</p>
<h3>कार्यक्रम का वीडियो</h3>
<div style="position: relative; width: 100%; height: 0; padding-bottom: 56.25%; overflow: hidden;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="सर्वपितृ अमावस्या ऑनलाइन तर्पण — Krishna Guruji" src="https://www.youtube-nocookie.com/embed/Hptdfaolv6I" width="560" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><a href="https://youtu.be/Hptdfaolv6I" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br class="yoast-text-mark" />lass=&#8221;yoast-text-mark&#8221; /&gt;&gt;कार्यक्रम का वीडियो YouTube पर देखें<br />
</a></p>
<h3>आयोजन से संबंधित दूसरा वीडियो</h3>
<div style="position: relative; width: 100%; height: 0; padding-bottom: 56.25%; overflow: hidden;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="सर्वपितृ अमावस्या आयोजन से संबंधित दूसरा वीडियो" src="https://www.youtube-nocookie.com/embed/BbCVFB8PW8Q" width="560" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p><a href="https://youtu.be/BbCVFB8PW8Q" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><br />
दूसरा वीडियो YouTube पर देखें<br />
</a></p>
<h2>विश्व परिवार का आभार</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी ने सहयोगी पंडितों, जयलक्ष्मी जी, Divine Astro Healing परिवार और  जुड़े सभी सहभागियों का आभार व्यक्त किया।</p>
<p>उनके सहयोग से तीर्थ दर्शन, सामूहिक प्रार्थना और भोजन सेवा का यह आयोजन संभव हुआ।</p>
<p>सत्र का समापन  सामूहिक शांति पाठ से हुआ।</p>
<p><strong>पितृ देवेभ्यो नमः।<br />
ॐ शान्तिः शान्तिः </strong></p>
<h2>पितृ तर्पण  पर संबंधित लेख</h2>
<ul>
<li><a href="https://krishnaguruji.com/pitru-tarpan-kya-hai-kaliyug-puran/"><br />
पितृ तर्पण क्या है? कलयुग पुराण की दृष्टि<br />
</a></li>
<li><a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-agli-pidhi-hamara-shradh/"><br />
क्या हमारी अगली पीढ़ी करेगी हमारा श्राद्ध?<br />
</a></li>
<li><a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-2026-pitron-ko-kaise-prasann-kare/"><br />
पितृपक्ष 2026: कलयुग में पितरों को कैसे करें प्रसन्न?<br />
</a></li>
</ul>
<p><strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’</strong><br />
आध्यात्मिक चिंतक | Spiritual Thinker<br />
कृष्णा गुरुजी सोशल वेलफेयर सोसाइटी</p>
</article>
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		<item>
		<title>सर्वपितृ अमावस्या 2026: सात तीर्थों से ऑनलाइन सामूहिक तर्पण &#124; Krishna Guruji</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/sarva-pitru-amavasya-2026-online-samuhik-tarpan/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Oct 2026 11:25:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सर्वपितृ अमावस्या पर कृष्णा गुरुजी सात पितृ तीर्थों को जोड़कर निःशुल्क ऑनलाइन सामूहिक तर्पण आयोजित करेंगे। 10 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:30 बजे ज्ञात-अज्ञात और असमय दिवंगतों को श्रद्धांजलि दी जाएगी।</p>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/sarva-pitru-amavasya-2026-online-samuhik-tarpan/">सर्वपितृ अमावस्या 2026: सात तीर्थों से ऑनलाइन सामूहिक तर्पण | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi"><strong>इंदौर, 9 अक्टूबर 2026। सर्वपितृ अमावस्या 2026</strong> पर सात पितृ तीर्थों से ऑनलाइन सामूहिक तर्पण होगा।</p>
<p>आध्यात्मिक चिंतक <strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’</strong> इस सभा का मार्गदर्शन करेंगे।</p>
<p>कार्यक्रम <strong>10 अक्टूबर को सुबह 10:30 बजे भारतीय समय</strong> पर शुरू होगा।</p>
<p>इस अवसर पर अपने पितरों को याद किया जाएगा। साथ ही उन ज्ञात-अज्ञात लोगों को श्रद्धांजलि दी जाएगी, जिनकी मृत्यु असमय हुई।</p>
<p>उनके परिवारों के लिए भी शांति और संबल की प्रार्थना होगी।</p>
<h2>सर्वपितृ अमावस्या 2026 पर जुड़ेंगे सात तीर्थ</h2>
<p>गयाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, चाणोद, त्र्यंबकेश्वर, पुष्कर और उज्जैन के सिद्धवट से पंडितजन जुड़ेंगे।</p>
<p>पहले वे तीर्थों के दर्शन कराएंगे। इसके बाद सभी को तर्पण की विधि बताएंगे।</p>
<p>कई लोग पितृ तीर्थों तक नहीं पहुँच पाते। इसलिए वे इस सभा में अपने घर से भाग ले सकते हैं।</p>
<p>इसके अलावा विदेश में रहने वाले लोग भी ऑनलाइन दर्शन और प्रार्थना कर सकेंगे।</p>
<h2>असमय दिवंगत लोगों को श्रद्धांजलि</h2>
<p>इस वर्ष इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पेयजल त्रासदी में जान गंवाने वाले लोगों को याद किया जाएगा।</p>
<p>साथ ही वृंदावन की नाव दुर्घटना के दिवंगत श्रद्धालुओं का स्मरण होगा। पुणे के केतन अग्रवाल को भी श्रद्धांजलि दी जाएगी।</p>
<p>इसके अलावा अन्य ज्ञात-अज्ञात दिवंगतों के लिए भी प्रार्थना होगी। इस तरह सभा में अपने परिवार के साथ पूरे मानव परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की जाएगी।</p>
<h2>ग्यारह वर्षों से जारी सेवा</h2>
<p>कृष्णा गुरुजी के अनुसार, वे विगत ग्यारह वर्षों से सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण और प्रार्थना करते आ रहे हैं।</p>
<p>उनके कार्य का आधार है <strong>“वसुधैव कुटुम्बकम्—विश्व एक परिवार है।”</strong> इसलिए इस पहल में उन लोगों का भी स्मरण होता है, जिनसे हमारा निजी परिचय नहीं था।</p>
<p>इस सेवा की पृष्ठभूमि जानने के लिए पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/152-lawaris-asthiyon-ka-visarjan-krishna-guruji/">152 लावारिस अस्थियों का विसर्जन और पूर्व मीडिया कवरेज</a>।<br />
इस लेख में सिद्धवट पर की गई सेवा का विवरण है। साथ ही संबंधित मीडिया रिपोर्टें भी जुड़ी हैं।</p>
<h2>MP Tak की पूर्व मीडिया रिपोर्ट</h2>
<p>इस वीडियो में कृष्णा गुरुजी की पूर्व सेवा से जुड़ी रिपोर्ट देखें। यह पुराने आयोजन का संदर्भ है। इसे 10 अक्टूबर 2026 की सभा की कवरेज न समझें।</p>
<div style="position: relative; width: 100%; height: 0; padding-bottom: 56.25%; margin: 20px 0;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="कृष्णा गुरुजी की पूर्व सेवा पर MP Tak की रिपोर्ट" src="https://www.youtube.com/embed/BORWVZkRnRQ" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p>इसके अलावा वीडियो सीधे खोलने के लिए<br />
<a href="https://youtu.be/BORWVZkRnRQ?si=tMihqexSwd-xCBTh" target="_blank" rel="noopener noreferrer">MP Tak की रिपोर्ट YouTube पर देखें</a>।</p>
<h2>देश-विदेश से जुड़ सकेंगे लोग</h2>
<p>भारत के साथ अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और मलेशिया से भी श्रद्धालु जुड़ेंगे।</p>
<p>इस प्रकार सभी एक साथ तीर्थ दर्शन और पितृ स्मरण कर सकेंगे। साथ ही दिवंगतों के परिवारों के लिए प्रार्थना करेंगे।</p>
<h2>ऑनलाइन तर्पण में कैसे जुड़ें?</h2>
<ul>
<li><strong>दिनांक:</strong> शनिवार, 10 अक्टूबर 2026</li>
<li><strong>समय:</strong> सुबह 10:30 बजे, भारतीय समय</li>
<li><strong>माध्यम:</strong> Zoom</li>
<li><strong>Meeting ID:</strong> 9826070286</li>
<li><strong>सहभागिता:</strong> पूर्णतः निःशुल्क</li>
</ul>
<p><strong>किसी भी प्रकार का दान या डोनेशन स्वीकार नहीं किया जाएगा।</strong></p>
<p>जुड़ने के लिए<br />
<a href="https://zoom.us/j/9826070286" target="_blank" rel="noopener noreferrer">Zoom मीटिंग का लिंक खोलें</a>।<br />
इसके बाद स्क्रीन पर दिए निर्देशों का पालन करें। अथवा Zoom ऐप में <strong>Join</strong> दबाकर मीटिंग आईडी डालें।</p>
<h2>तर्पण की सामग्री</h2>
<p>जल से भरा एक पात्र, एक खाली पात्र, थोड़ा दूध, काले तिल और कुशा लेकर बैठें। इसके बाद पंडितजन के मार्गदर्शन में तर्पण करें।</p>
<h2>पितृ तर्पण का अर्थ समझें</h2>
<p>तर्पण के भाव को जानने के लिए पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/pitru-tarpan-kya-hai-kaliyug-puran/">पितृ तर्पण क्या है? जल अर्पण का अर्थ और कृतज्ञता</a>।</p>
<p>इसके अलावा<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-ka-mahatva-kaliyug-puran/">पितृ पक्ष का महत्व</a><br />
और<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/social-service-initiatives/">कृष्णा गुरुजी की सामाजिक सेवा</a><br />
के बारे में भी जानें।</p>
<p><strong>सभी सादर आमंत्रित हैं।</strong> आइए, पितरों को याद करें। साथ ही असमय दिवंगत लोगों को श्रद्धांजलि दें।</p>
<p><strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’</strong><br />
आध्यात्मिक चिंतक<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/">krishnaguruji.com</a></p>
</article>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/sarva-pitru-amavasya-2026-online-samuhik-tarpan/">सर्वपितृ अमावस्या 2026: सात तीर्थों से ऑनलाइन सामूहिक तर्पण | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
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		<title>पितृपक्ष में क्या हमारी अगली पीढ़ी करेगी हमारा श्राद्ध? &#124; Kaliyug Puran &#124; Krishna Guruji</title>
		<link>https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-agli-pidhi-hamara-shradh/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[krishna guruji]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Oct 2026 17:12:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>व्यस्त जीवन में श्राद्ध की परंपरा कैसे आगे बढ़े? Krishna Guruji से जानें बच्चों को पूर्वजों, पारिवारिक संस्कार और कृतज्ञता से जोड़ने का सरल विचार।</p>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-agli-pidhi-hamara-shradh/">पितृपक्ष में क्या हमारी अगली पीढ़ी करेगी हमारा श्राद्ध? | Kaliyug Puran | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<article lang="hi"><strong>पितृ पक्ष</strong> हमें अपने पूर्वजों को याद करने का अवसर देता है। लेकिन <strong>श्राद्ध की परंपरा</strong> हमारी अगली पीढ़ी तक कैसे पहुँचेगी?</p>
<p>क्या हमारे बच्चे भी हमारा श्राद्ध करेंगे? यह प्रश्न आज परिवारों में संवाद का विषय बन सकता है।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी अपनी <strong>कलियुग पुराण की दृष्टि</strong> से इसी विषय पर चिंतन करते हैं। उनके अनुसार, बच्चों को परंपरा का अर्थ समझाना जरूरी है</p>
<p>। साथ ही, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के सरल अवसर भी देने चाहिए।</p>
<p>इस लेख में पारिवारिक संस्कार, पूर्वजों का स्मरण और सेवा पर चर्चा है। इसके अलावा, व्यस्त जीवन में परंपरा से जुड़े रहने के सुझाव भी हैं।</p>
<h2>वीडियो देखें: क्या हमारी अगली पीढ़ी करेगी हमारा श्राद्ध?</h2>
<p>इस संवाद में कृष्णा गुरुजी भविष्य की एक कल्पना रखते हैं। सौ वर्ष बाद पारिवारिक जीवन कैसा होगा?</p>
<p>उस समय बच्चे श्राद्ध पक्ष को किस रूप में अपनाएँगे?</p>
<div style="position: relative; width: 100%; height: 0; padding-bottom: 56.25%; overflow: hidden;"><iframe style="position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border: 0;" title="पितृ पक्ष में क्या हमारी अगली पीढ़ी करेगी हमारा श्राद्ध? कृष्णा गुरुजी" src="https://www.youtube.com/embed/yC5l1YUcWlw" allowfullscreen="allowfullscreen"><br />
</iframe></div>
<p>सीधा YouTube लिंक:<br />
<a href="https://youtu.be/yC5l1YUcWlw" target="_blank" rel="noopener noreferrer">https://youtu.be/yC5l1YUcWlw</a></p>
<h2>पितृ पक्ष और श्राद्ध की पारिवारिक परंपरा</h2>
<p>श्राद्ध पक्ष में अनेक परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हैं। उनकी तिथि पर भोजन तैयार किया जाता है।</p>
<p>ब्राह्मण को आमंत्रित करके सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है।</p>
<p>कई घरों में पूर्वजों के प्रिय व्यंजन भी बनते हैं। साथ ही, अन्य जीवों के लिए अन्न का अंश निकाला जाता है।</p>
<p>इन अवसरों पर परिवार के सदस्य एकत्र होते हैं।</p>
<p>इस तरह बच्चों को दादा-दादी और दूसरे पूर्वजों की कहानियाँ सुनने का अवसर मिलता है।</p>
<p>वे उनके संघर्ष और अच्छे गुणों को जान पाते हैं।</p>
<p>इसलिए ऐसे आयोजन पारिवारिक स्मृतियों को भी आगे बढ़ाते हैं।</p>
<p>विषय का व्यापक परिचय:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-ka-mahatva-kaliyug-puran/">कलियुग पुराण की दृष्टि से पितृ पक्ष का महत्त्व</a>।</p>
<h2>सौ साल बाद श्राद्ध का स्वरूप कैसा होगा?</h2>
<p>आज अनेक युवा नौकरी और व्यवसाय के कारण परिवार से दूर रहते हैं। कुछ दूसरे शहरों में हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>वहीं, कई बच्चे विदेशों में अपना जीवन सँभाल रहे हैं।</p>
<p>यात्रा, काम और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण हर अवसर पर घर पहुँचना संभव नहीं होता।</p>
<p>फिर भी, इससे उनके मन का प्रेम अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी वर्ष 2126 की कल्पना करते हुए एक प्रश्न उठाते हैं। क्या उस समय भी श्राद्ध का आयोजन आज जैसा होगा?</p>
<p>यह भविष्यवाणी नहीं, बदलती परिस्थितियों पर चिंतन है।</p>
<p>इसीलिए वे आज से संवाद शुरू करने का सुझाव देते हैं। हमें समझना होगा कि परंपरा का भाव नई पीढ़ी तक कैसे पहुँचाया जाए।</p>
<h2>क्या बच्चों को अपने दादा-दादी के नाम पता हैं?</h2>
<p>हम छोटी उम्र से बच्चों की प्रतिभा पहचानना चाहते हैं। किसी को क्रिकेट सिखाते हैं।</p>
<p>किसी को संगीत, विज्ञान या दूसरी गतिविधियों में आगे बढ़ाते हैं। यह अच्छी पहल है।</p>
<p>लेकिन इसके साथ एक सरल प्रश्न भी पूछें। क्या बच्चा अपने दादा-दादी और नाना-नानी के नाम जानता है?</p>
<p>क्या उसे उनके जीवन की कोई कहानी पता है?</p>
<blockquote><p>“बच्चे को सफल बनाने के साथ उसकी जड़ों से भी जोड़ें। उसे पता हो कि उसके जीवन के पीछे कितनी पीढ़ियों का योगदान है।”</p>
<p>— कृष्णा गुरुजी</p></blockquote>
<p>यह बात सभी बच्चों के बारे में सामान्य निष्कर्ष नहीं है। इसका उद्देश्य बड़ों को अपनी भूमिका याद दिलाना है।</p>
<p>आखिर परिवार का परिचय घर से ही शुरू होता है।</p>
<h3>परिवार की स्मृतियाँ साझा करने के सरल तरीके</h3>
<ul>
<li>बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के नाम बताएँ।</li>
<li>पुरानी तस्वीरें दिखाकर उनमें मौजूद लोगों का परिचय दें।</li>
<li>पूर्वजों के जीवन की छोटी और सच्ची कहानियाँ सुनाएँ।</li>
<li>उनके अच्छे गुणों को दैनिक व्यवहार से जोड़ें।</li>
<li>परिवार की एक सरल वंशावली तैयार करें।</li>
<li>बुजुर्गों से बातचीत के लिए नियमित समय निकालें।</li>
</ul>
<p>इस प्रकार, अगली पीढ़ी और संस्कार का संबंध अनुभवों से बनता है। केवल निर्देश देने की तुलना में साझा समय अधिक आत्मीय हो सकता है।</p>
<h2>पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का क्या अर्थ है?</h2>
<p>हमारा जीवन केवल हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है। माता-पिता का पालन-पोषण और पिछली पीढ़ियों का श्रम भी इसमें शामिल है।</p>
<p>इसलिए उनके योगदान को स्वीकार करना कृतज्ञता का एक रूप है।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी अपने संवाद में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का उल्लेख करते हैं। अपनी समकालीन व्याख्या में वे इन्हें तीन भावों से जोड़ते हैं।</p>
<ul>
<li><strong>देव ऋण:</strong> जीवन को सहारा देने वाली प्रकृति और दैवी व्यवस्था के प्रति आदर।</li>
<li><strong>ऋषि ऋण:</strong> ज्ञान देने वाले ऋषियों, गुरुओं और ज्ञान-परंपरा के प्रति आभार।</li>
<li><strong>पितृ ऋण:</strong> जीवन और संस्कार देने वाले माता-पिता तथा पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता।</li>
</ul>
<p>उनका संदेश है कि ऐसे योगदान का मूल्य केवल धन से नहीं चुकाया जा सकता। हालाँकि, हम अपने आचरण और सेवा से आभार व्यक्त कर सकते हैं।</p>
<h2>शास्त्रीय संदर्भ में तर्पण और जीवकल्याण</h2>
<p><strong>मनुस्मृति 3.70</strong> में “पितृयज्ञस्तु तर्पणम्” कहा गया है। अर्थात तर्पण को पितृयज्ञ के रूप में स्थान दिया गया है।</p>
<p>इसी प्रकार, <strong>विष्णु पुराण के तृतीय अंश, अध्याय 11</strong> में देव, ऋषि और पितरों के तर्पण का वर्णन है। आगे अन्य जीवों की तृप्ति की प्रार्थना भी मिलती है।</p>
<p>ये संदर्भ तर्पण और व्यापक जीवकल्याण की भावना समझने में सहायक हैं। हालाँकि, इनसे ऑनलाइन दान को हर अनुष्ठान का समान विकल्प नहीं मानना चाहिए।</p>
<p>ऑनलाइन सहयोग का सुझाव आधुनिक जीवन के लिए कृष्णा गुरुजी की व्यावहारिक व्याख्या है।</p>
<ul>
<li><a href="https://www.sanskritsahitya.org/vishnupuranam/3.11" target="_blank" rel="noopener noreferrer">विष्णु पुराण: तृतीय अंश, अध्याय 11</a></li>
<li><a href="https://www.wisdomlib.org/hinduism/book/manusmriti-with-the-commentary-of-medhatithi/d/doc199849.html" target="_blank" rel="noopener noreferrer">मनुस्मृति 3.70: तर्पण को पितृयज्ञ कहने का संदर्भ</a></li>
</ul>
<p>तर्पण के अर्थ और हस्ततीर्थों के बारे में पढ़ें:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/pitru-tarpan-kya-hai-kaliyug-puran/">पितृ तर्पण क्या है? कलियुग पुराण की दृष्टि</a>।</p>
<h2>व्यस्त जीवन में श्राद्ध की भावना कैसे बनाए रखें?</h2>
<p>जो परिवार पारंपरिक विधि से श्राद्ध कर सकते हैं, वे अपनी परंपरा निभाएँ। वहीं, समय और व्यवस्था का अभाव हो तो स्मरण तथा सेवा के अवसर चुनें।</p>
<p>कृष्णा गुरुजी का सुझाव है कि बच्चों को पहले इसका उद्देश्य समझाएँ। उनसे कहें कि पूर्वजों की स्मृति किसी अच्छे कार्य से भी जुड़ सकती है।</p>
<p>इसके लिए बड़े आयोजन की शर्त रखना आवश्यक नहीं है। अपनी क्षमता से किया गया उपयोगी सहयोग भी बच्चों को कृतज्ञता का अभ्यास सिखा सकता है।</p>
<h3>पूर्वजों की स्मृति में सेवा के विकल्प</h3>
<ul>
<li><strong>वृद्धाश्रम:</strong> आवश्यकता पूछकर भोजन या जरूरी सामग्री की व्यवस्था करें।</li>
<li><strong>बालगृह और शिक्षा:</strong> बच्चों की पढ़ाई या दैनिक आवश्यकताओं में सहयोग दें।</li>
<li><strong>अन्नक्षेत्र:</strong> जरूरतमंद लोगों के भोजन में सहायता करें।</li>
<li><strong>गौशाला:</strong> चारा, पानी और देखभाल की वास्तविक जरूरतों में योगदान दें।</li>
<li><strong>पशु-पक्षी सेवा:</strong> उपयुक्त भोजन और स्वच्छ पानी की व्यवस्था में सहयोग करें।</li>
</ul>
<p>सभी जगह दान करना अनिवार्य नहीं है। परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक सेवा भी चुन सकता है। इसके अलावा, बच्चों को उस निर्णय में शामिल करें।</p>
<p>संबंधित लेख:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-2026-pitron-ko-kaise-prasann-kare/">पितृपक्ष 2026: कलियुग में पितरों को कैसे करें प्रसन्न?</a></p>
<h2>ऑनलाइन दान करते समय क्या ध्यान रखें?</h2>
<p>दूर रहकर सहयोग करने के लिए ऑनलाइन माध्यम उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन केवल तस्वीर या भावनात्मक अपील देखकर भुगतान न करें। पहले संस्था की पहचान और जरूरत समझें।</p>
<ul>
<li>संस्था का आधिकारिक संपर्क और भुगतान विवरण जाँचें।</li>
<li>पूछें कि सहयोग किस काम में उपयोग होगा।</li>
<li>भुगतान की रसीद या पुष्टि सुरक्षित रखें।</li>
<li>संभव हो तो स्थानीय परिचित से संस्था की जानकारी लें।</li>
<li>सहायता के उपयोग की उचित जानकारी माँगें।</li>
</ul>
<p>इस तरह दान एक जागरूक सेवा-संकल्प बन सकता है। साथ ही, बच्चे जिम्मेदारी से सहयोग करना भी सीखते हैं।</p>
<h2>श्राद्ध की तिथि याद न हो तो क्या करें?</h2>
<p>मृत्यु की अंग्रेजी तारीख और हिंदू तिथि एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए केवल तारीख देखकर हर वर्ष वही श्राद्ध-तिथि मान लेना उचित नहीं है।</p>
<p>तिथि जानने के लिए मृत्यु की तारीख, वर्ष, समय और स्थान की जानकारी उपयोगी होती है।</p>
<p>विश्वसनीय पंचांग या जानकार पुरोहित से इसकी पुष्टि कराएँ।</p>
<p>तिथि ज्ञात न होने पर सर्वपितृ अमावस्या पूर्वजों के सामूहिक स्मरण का प्रचलित अवसर है।</p>
<p>धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपनी कुलपरंपरा का मार्गदर्शन लें।</p>
<p>वहीं, स्मृति-सेवा के लिए परिवार एक सुविधाजनक दिन तय कर सकता है।</p>
<p>उस दिन पूर्वजों को याद करें और बच्चों के साथ कोई उपयोगी कार्य करें।</p>
<h2>पितृ स्मरण और ध्यान का भाव</h2>
<p>वीडियो के अंत में माता-पिता और दादा-दादी के स्मरण पर आधारित ध्यान कराया गया है।</p>
<p>इसका उद्देश्य अपने जीवन में उनके योगदान को याद करना है।</p>
<p>सरल अभ्यास के लिए आराम से बैठें। श्वास सामान्य रखें। फिर माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी का चेहरा याद करें।</p>
<p>उनके किसी अच्छे गुण के प्रति आभार व्यक्त करें।</p>
<p>यदि चेहरा याद न हो तो उनका नाम स्मरण कर सकते हैं। आँखें बंद करना आवश्यक नहीं है।</p>
<p>भावुकता बढ़े तो विराम लें।</p>
<p>वीडियो की श्वास-संबंधी भाषा में एक स्पष्टता जरूरी है। एक नासिका से श्वास लेने का अर्थ केवल उसी ओर के</p>
<p>फेफड़े का उपयोग करना नहीं है। श्वास रोकने या जोर लगाने के बजाय सहज श्वसन रखें।</p>
<p>इस विषय से जुड़ा लेख:<br />
<a href="https://krishnaguruji.com/pitru-pranayama-a-breath-based-remedy-for-pitru-dosh/">पितृ प्राणायाम और पूर्वजों के स्मरण पर विचार</a>।</p>
<h2>जीवित माता-पिता को आज समय दें</h2>
<p>पूर्वजों की स्मृति का सम्मान करते हुए जीवित बुजुर्गों की जरूरतों पर भी ध्यान दें। उनके साथ बैठना और</p>
<p>उनकी बातें सुनना रिश्ते को मजबूत कर सकता है।</p>
<p>सुविधाएँ और उपहार प्रेम की अभिव्यक्ति हैं। इसके साथ समय और संवाद भी जरूरी हैं। इसलिए परिवार में नियमित बातचीत की आदत बनाएँ।</p>
<p>बच्चे जब बड़ों को अपने माता-पिता का सम्मान करते देखते हैं, तो वे व्यवहार से सीखते हैं। इस प्रकार संस्कार दैनिक जीवन का हिस्सा बनते हैं।</p>
<h2>अगली पीढ़ी को कैसी विरासत दें?</h2>
<blockquote><p>“बच्चों के लिए संपत्ति और अवसर छोड़ें। साथ ही, परिवार की स्मृतियाँ और सेवा के संस्कार भी दें।</p>
<p>उन्हें पता हो कि उनके जीवन के पीछे किन लोगों का योगदान है।”</p>
<p>— कृष्णा गुरुजी</p></blockquote>
<p>पितृ पक्ष का यह चिंतन हमें अपने व्यवहार की ओर लौटाता है। बच्चों से भविष्य में सम्मान की अपेक्षा रखने के साथ आज उन्हें आत्मीय अनुभव दें।</p>
<p>पूर्वजों की कहानियाँ सुनाएँ। उनके अच्छे गुणों पर चर्चा करें। फिर स्मरण को किसी उपयोगी सेवा से जोड़ें।</p>
<p>यही कलियुग पुराण की इस व्याख्या का संदेश है।</p>
<h2>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न</h2>
<h3>बच्चों को श्राद्ध का अर्थ कैसे समझाएँ?</h3>
<p>उन्हें बताएँ कि यह दिवंगत पूर्वजों के स्मरण और सम्मान की परंपरा है। परिवार की कहानियों और सेवा के छोटे कार्यों से शुरुआत करें।</p>
<h3>क्या ऑनलाइन दान सभी श्राद्ध-कर्मों का विकल्प है?</h3>
<p>ऐसा सार्वभौमिक दावा नहीं किया जा सकता। यहाँ ऑनलाइन सहयोग को कृतज्ञता व्यक्त करने का समकालीन सेवा-माध्यम बताया गया है।</p>
<h3>क्या परिवार की स्मृतियाँ डिजिटल रूप में रख सकते हैं?</h3>
<p>हाँ। तस्वीरों, नामों और छोटी जीवन-कथाओं का पारिवारिक संग्रह बना सकते हैं। बुजुर्गों की सहमति से उनकी यादें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं।</p>
<h3>क्या सेवा के लिए बड़ी राशि जरूरी है?</h3>
<p>नहीं। अपनी क्षमता से वास्तविक जरूरत पूरी करना महत्त्वपूर्ण है। समय, उपयोगी सामग्री और प्रत्यक्ष सहायता भी सेवा के रूप हैं।</p>
<p><strong>कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’</strong><br />
अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक<br />
कलियुग पुराण की दृष्टि</p>
<p><a href="https://krishnaguruji.com/">https://krishnaguruji.com/</a></p>
</article>
<p>The post <a href="https://krishnaguruji.com/pitru-paksha-agli-pidhi-hamara-shradh/">पितृपक्ष में क्या हमारी अगली पीढ़ी करेगी हमारा श्राद्ध? | Kaliyug Puran | Krishna Guruji</a> appeared first on <a href="https://krishnaguruji.com">krishnaguruji</a>.</p>
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